उच्च शिक्षा आयोग : इन कारणों से भयभीत हैं बुद्धिजीवी

वास्तविक शैक्षणिक आजादी,आर्थिक विकास और सही मायने में किसी समतावादी समाज की कुंजी है और यह आज़ादी एक स्वतंत्र, सरकारी रूप से वित्त पोषित उच्च शिक्षा प्रणाली के तहत ही संभव है। लोकेश कुमार अपने इस लेख में बताते हैं कि एचईसीआई विधेयक जानबूझकर इस सच्चाई से बेख़बर है और यह वर्जनात्मक और मुनाफ़ाख़ोर ब्राह्मणवादी, कॉर्पोरेट एजेंडे से संचालित है

एचईसीआई बिल: शैक्षणिक स्वतंत्रता को समाप्त किये जाने वाली परिकल्पना  

– लोकेश कुमार

उच्च शिक्षा प्रणाली और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को विभिन्न स्तरों पर विभिन्न सुधारों की आवश्यकता है। इस बारे में चर्चाएं लंबे समय से चल रही हैं।  चाहे कोठारी आयोग (1964-1966) हो या यशपाल समिति (2009), दोनों में कई सुझाव और सिफारिशें हैं, लेकिन उच्च शिक्षा से संबंधित मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं। यशपाल समिति ने सभी मुद्दों की समग्रता और निष्पक्षता से जांच-पड़ताल की थी, और स्वायत्तता के बुनियादी सिद्धांत पर किसी तरह का कोई समझौता किए बिना उच्च शिक्षा और अनुसंधान के सभी क्षेत्रों को नियमित करने को लेकर “उच्च शिक्षा और अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय आयोग” नामक एक व्यापक संवैधानिक निकाय के गठन का सुझाव दिया था। असल में एक ऐसा विनियामक ढांचा बनाने का विचार था,जो उच्च शिक्षा को प्रकृति में लोकतांत्रिक और समावेशी बनाते हुए किसी भी तरह के राजनीतिक हस्तक्षेप से उच्च शिक्षा प्रणाली की रक्षा कर सके।

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