रघुबर सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ 24 अक्टूबर को पदयात्रा

झारखंड में आदिवासी अपने विभिन्न मांगों को लेकर आगामी 24 अक्टूबर से लेकर 30 अक्टूबर तक पदयात्रा करेंगे। यह पदयात्रा घाटशिला से शुरु होकर रांची तक जाएगी। इसके मुद्दों और तैयारियों के बारे में बता रहे हैं विशद कुमार :

झारखण्ड़ जनतांत्रिक महासभा ने विभिन्न मांगों को लेकर आगामी 24 अक्टूबर 2018 को पदयात्रा का आह्वान किया है। करीब 200 किलोमीटर की यह पदयात्रा घाटशिला से शुरु होकर जमशेदपुर होते हुए आगामी 30 अक्टूबर को रांची में समाप्त होगी। महासभा द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक इस पदयात्रा में बड़ी संख्या में लोग शामिल होंगे। यह कार्यक्रम झारखंड अलग राज्य गठन के बाद अपने तरह का पहला कार्यक्रम है जिसकी धमक से रघुबर सरकार की बेचैनी बढ़ गई है।

इस पदयात्रा के एजेंडों के बारे में आयोजक दीपक रंजीत और बीरेंद्र कुमार ने बताया कि इस पदयात्रा के लिए तीन नारे हैं। इनमें पहला ‘झारखंड बचाओ देश बचाओ’, दूसरा ‘जान-जमीन-रोजगार बचाओ’ और तीसरा नारा ‘संघ-भाजपा मुक्त देश बनाओ’ है। उन्होंने कहा कि मुख्य मुद्दों में देश भर में हो रहे मॉब लिंचिंग, भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 में संशोधन के खिलाफ, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं,  ट्रांसजेंडर और अन्य वंचितों जनों पर बढ़ते हमले, आम नागरिकों के संवैधानिक व लोकतांत्रिक अधिकारों पर बढ़ते हमले, झारखंड में एसटी, एससी, अति पिछड़ा वर्ग और अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 73 प्रतिशत करने, झारखंड में कार्यरत सभी अनुबंधकर्मी (पारा शिक्षक, पारा स्वास्थ्यकर्मी, मनरेगाकर्मी, आँगनबाड़ी सेविका, सहिया, जलसहिया, बिजलीकर्मी, रसोइया एवं अन्य अनुबन्धकर्मी) के स्थायीकरण आदि शामिल है।

आयोजकों के मुताबिक पदयात्रा को सफल बनाने के लिए पूरे झारखंड में जोर-शोर से तैयारी की जा रही है। सुदूर इलाकों में लोगों के साथ बैठकें और जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।

झारखंड जनतांत्रिक महासभा द्वारा सोशल मीडिया पर जारी एक बैनर

दीपक रंजीत के अनुसार यह कार्यक्रम झारखंड अलग राज्य गठन के बाद अपनी तरह का पहला कार्यक्रम है जिसने रघुबर सरकार की नींद हराम कर दी है। इस पदयात्रा में राज्य के सभी पांच प्रमंडलों से लोग शामिल होंगे। उन्होंने रघुबर सरकार पर कारपोरेट परस्ती का आरोप लगाते हुए कहा कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार से कदमताल करते हुए झारखंड की रघुबर सरकार ने झारखंड के अस्तित्व पर ही हमला बोल दिया है। जनता के संवैधानिक लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला तेज कर दिया है। सरकार कॉरपोरेटों द्वारा जल-जंगल-जमीन की खुल्लम-खुल्ला लूट का रास्ता आसान बनाने के लिए सबकुछ कर रही है। जबकि जनता के लोकतांत्रिक अधिकार कुचले जा रहे हैं।

  • 210 एमओयू के जरिए 3.10 लाख एकड़ जमीन का सौदा

  • गैर मजरुआ जमीन आदिवासियों से छीन कारपोरेट कंपनियों को दे रही रघुबर सरकार

  • डेढ़ दशक पहले झारखंड सरकार ने किया 73 फीसदी आरक्षण का फैसला

उन्होंने कहा कि देश और झारखण्ड में हाल के दिनों में दर्जन से ज्यादा भूख से मौतें हो चुकी है। जरूरतमंदों को राशन तक नहीं मिल रहा है। गरीबी-बेरोजगारी-पलायन-विस्थापन का दायरा बढ़ता जा रहा है। शिक्षा-चिकित्सा बदहाल है। स्वच्छ पेयजल भी सबको मयस्सर नहीं है। वहीं दूसरी तरफ देश भर में लगातार दलित समुदाय के ऊपर हमले बढ़े हैं तथा बर्बर तरीके से प्रताड़ित करने की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है। देश भर में महिलाओं के ऊपर अत्याचार, बलात्कार तथा बर्बरतम तरीके से उनकी की हत्या किए जाने की घटनाओं में भी लगातार वृद्धि हो रही है। देश में जनविरोधी किसानविरोधी सरकारी नीतियों की वजह से तथा कृषि क्षेत्र को बिल्कुल भी खत्म करने की सरकारी साजिश की वजह से देश के अंदर हजारों किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

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दीपक रंजीत ने बताया कि झारखंड के आदिवासी सरकार के भूमि अधिग्रहण नीतियों के खिलाफ हैं। सरकार कॉरपोरेटों के फायदे के लिए जल-जंगल-जमीन की लूट को अधिकतम आसान बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में संशोधन कर चुकी है। इस संशोधित कानून के माध्यम से बिना किसी रोक-टोक के तथा ग्रामसभा के बिना कोई निर्णायक भूमिका दिये मनमाना अधिग्रहण होगा। इस प्रकार लंबे संघर्ष से हासिल अधिकार और खासतौर पर आदिवासियों को हासिल कानूनी सुरक्षा कवच भी खत्म किया जा रहे है। कृषि योग्य जमीन की बेपनाह लूट का रास्ता खोल दिया गया है। खाद्य सुरक्षा भी खतरे में हैं नतीजा भूख का भूगोल बढ़ेगा। पर्यावरण बर्बाद होगां बेरोजगारी-विस्थापन और पलायन बढ़ेगा। कहिए तो झारखंड के अस्तित्व पर संकट बढ़ेगा।

उन्होंने कहा कि पिछले दिनों सीएनटी-एसपीटी एक्ट को खत्म करने के खिलाफ निर्णायक लड़ाई हुई थी। सरकार को पीछे हटना पड़ा। लेकिन दूसरे रास्ते से लैंड बैंक के जरिए लगभग 21 लाख एकड़ गैरमजरुआ जमीन लूट ली गयी। हाल ही में 210 एमओयू के जरिए 3.10 लाख एकड़ जमीन का सौदा हुआ है। साथ ही यह भी कहा कि रघुबर सरकार कॉरपोरेट हित में और भी कदम उठा रही है।  ग्रामसभा की भूमिका खत्म कर देने के लिए नौकरशाही के नेतृत्व में ग्राम विकास समिति/आदिवासी विकास समिति के नाम से गैरकानूनी-गैरसंवैधानिक संस्थाओ का निर्माण किया गया है।

सोशल मीडिया पर पदयात्रा के समर्थन में लोग बना रहे हैं अपनी प्रोफाइल तस्वीर

दीपक के अनुसार ग्राम स्वायत्त सभा की स्वायत्तता की भावना से शुरु हुए पत्थलगड़ी आंदोलन को विवादास्पद गैंगरेप सहित अन्य बहाने से कुचल दिया गया है। यह आंदोलन ग्राम सभा के कानूनी व संवैधानिक अधिकार को बुलंद करने के साथ सचमुच में कॉरपोरेट लूट के खिलाफ जाता है। इस आंदोलन के पक्ष में सोशल मीडिया में लिखने वाले 20 सामाजिक कार्यकर्ताओं-बुद्धिजीवियों पर देशद्रोह का मुकदमा लाद दिया गया है। साथ ही देश भर में से सामाजिक सरोकार रखने वाले मानवाधिकार कर्मियों-बुद्धिजीवियों को ‘अर्बन नक्सलिज्म’ के नाम से गिरफ्तार कर प्रताड़ित किया जा रह है।

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उन्होंने कहा कि केंद्र और झारखंड सरकार आरक्षण को लेकर भी दोहरा रवैया अपना रही हैं। आरक्षित वर्गों को मिलने वाले आरक्षण और सामाजिक न्याय पर हमला जारी है। ऐसे में आज जरुरी हो गया है कि इस मोर्चे पर भी संघर्ष तेज होना चाहिए। उन्होंने कहा कि डेढ़ दशक पहले झारखंड कैबिनेट ने एसटी, एससी, इबीसी/एमबीसी व ओबीसी आरक्षण के दायरे को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 73 प्रतिशत करने का फैसला लिया था। लेकिन हाईकोर्ट के रोक के बाद जाती-आती सरकारें चुप हैं। सरकार को चाहिए कि 73 प्रतिशत आरक्षण को विधानसभा से पारित कराकर केन्द्र सरकार को भेजे और केन्द्र सरकार 9वीं अनुसूची में डाले।

उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र की नौकरियों में भी तथा सभी तरह के ठेका-पट्टा में भी आरक्षण लागू करवाने के लिए भी संघर्ष करने की जरूरत है। और इसी कड़ी में हमलोगों को झारखंड राज्य में महिलाओं को हरेक वर्ग के अंदर 50 प्रतिशत आरक्षण को लागू करवाने और ट्रांसजेंडर के लिए भी आरक्षण लागू करवाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ने की जरूरत है।

दीपक रंजीत कहते हैं कि झारखंड का इतिहास प्रतिरोध, संघर्ष और आन्दोलन का इतिहास रहा है। आजादी के पहले से और बाद में भी लगातार हम लड़ रहे हैं। आज जब हमारे अस्तित्व पर चौतरफा व अधिकतम हमला बोल दिया गया है। हमें अधिकतम ताकत संगठित कर प्रतिरोध करना होगा। झारखंड की जनता सत्ता के इर्द-गिर्द चलने वाली विपक्षी राजनीतिक शक्तियों की भी मोहताज नहीं है। वह लड़ रही है। जमीनी स्तर पर प्रतिरोध की शक्तियां मौजूद हैं। स्वतंत्र सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और संघर्षरत संगठन- आंदोलनकारी समूह मैदान में डटे हुए हैं।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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