बौद्धिक लोकतंत्र को नष्ट करने पर आमादा है यूजीसी

यूजीसी एकबार फिर अपने अपराध को स्वीकार करने के बजाय ‘पीयर रिव्यू’ का भ्रम फैला रहा है। ‘द हिन्दू’ में प्रकाशित इस खबर और बौद्धिक जगत में यूजीसी की आलोचनाओं के बारे में बता रहे हैं कमल चंद्रवंशी :

इस समय जबकि देश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाएं और जर्नल्स यूजीसी की मान्यता सूची से बाहर करने के लिए सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, सरकार ये भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है कि उसने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे पत्रिकाओं की साख को नुकसान पहुंचा हो। साथ ही, ऐसी भी कोई कार्रवाई नहीं की है कि जिससे उच्च शिक्षण संस्थानों के स्कालर्स के सामने परेशानी पैदा हो गई है।

इस बारे में यूजीसी से मिली आधिकारिक जानकारी के मुताबिक,  मई 2018 के बाद के कोई परिवर्तन नहीं आया है। यानी आयोग से ब्लैकलिस्ट की गई 4305 पत्रिकाओं में से फिलहाल वह भी बहाल नहीं की गई हैं जो देश में आम से लेकर अकादमिक समाज में बड़ी प्रतिष्ठा रखती हैं। उनमें अन्य के साथ-साथ फारवर्ड प्रेस भी है। लेकिन इस बीच 12 सितंबर,2018 को ‘द हिंदू‘ ने एक खबर प्रकाशित की है कि पहले से मौजूद नियम के मुताबिक किसी भी शिक्षक को ‘पीयर-रिव्यूड‘ यानी (भारतीय संदर्भ में तथाकथित जानकारों से) समकक्ष पुनर्रीक्षण या पुनर्विलोकित या समीक्षित पत्रिकाओं में छपी सामग्री पर अंक अर्जित करने का लाभ दिया जाएगा। खबर के मुताबिक समकक्ष पुनर्रीक्षण का कदम उठाने से शिक्षकों को उनके शोध में स्कोर बढ़ाने में मदद मिलेगी। लेकिन हकीकत यह नहीं है। यहां हम अपने पाठकों को ‘पीयर-रिव्यूड’ की जानकारी और सच्चाई से रूबरू कराएंगे लेकिन पहले भ्रम में डालने वाली इस खबर की खबर ले लेते हैं।

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