झारखंड : फर्जी नक्सली सरेंडर मामले में हाई कोर्ट सुनाएगी निर्णायक फैसला

फर्जी पुलिस एनकाउंटर के तर्ज पर झारखंड में पुलिस ने अपनी नाक ऊंची रखने के लिए क्या फर्जी सरेंडर कराया था? सीबीआई को इसी सवाल का जवाब खोजना है। झारखंड सरकार अड़ंगा डाल रही है। अब सबकी निगाहें झारखंड हाई कोर्ट पर टिकी है। फारवर्ड प्रेस की खबर

514 आदिवासियों को नक्सली बता कराया था सरेंडर, हलक में अटकी झारखंड सरकार की जान

आगामी 2 नवंबर 2018 को झारखंड हाई कोर्ट एक ऐसे मामले में फैसला सुनाने जा रही है जिसे लेकर रांची के सियासी गलियारे में खलबली तो मची ही है दिल्ली के नार्थ ब्लॉक स्थित गृह मंत्रालय में भी हलचल है। इस मामले की जद में झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबरदास भी हैं और पुलिस महानिदेशक डी. के. पांडे भी। यह मामला 2013 का है। तब रांची, खूंटी, गुमला व सिमडेगा आदि जिलों के 514 नक्सलियों को एक साथ सरेंडर करवाकर पुलिस महकमे ने अपनी नाक ऊंची कर ली थी।   

इस मामले में बीते 12 अक्टूबर 2018 को झारखंड हाई कोर्ट सुनवाई की थी और यह माना जा रहा है कि आगामी 2 नवंबर को वह निर्णायक फैसला सुनायेगी।

दरअसल केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय की एक योजना थी जिसके तहत नक्सल आंदोलन से जुड़े युवकों को मुख्यधारा से जोड़ा जाना था। सरेंडर करने वाले कथित नक्सलियों को सरकार तब आर्थिक सहायता से लेकर नौकरी देने का एलान कर रही थी। इसी योजना को अंजाम देने की कोशिश में झारखंड पुलिस ने एक एेसा फर्जीवाड़ा किया जिसके सामने आते ही सब चौंक गये। हुआ यह कि पुलिस और सीआरपीएफ ने रांची, खूंटी, गुमला व सिमडेगा आदि जिलों के 514 युवकों को सरेंडर कराया। उस समय सभी युवकों को सीआरपीएफ कोबरा बटालियन के जवानों की निगरानी में पुरानी जेल परिसर में रखा गया था और हथियार के साथ उनकी तस्वीरें ली जा रही थीं, उस वक्त सीआरपीएफ झारखंड सेक्टर के आईजी डी. के. पांडेय हुआ करते थे, जो आज  राज्य के डीजीपी हैं।

झारखंड के डीजीपी डी. के. पांडेय पर भी हैं संगीन आरोप

मामले का खुलासा 2013 में तब हुआ जब तत्कालीन आइजी (झारखंड सेक्टर) सीआरपीएफ के एम.वी. राव ने एक रिपोर्ट पुलिस मुख्यालय को भेजी। उन्होंने पुलिस मुख्यालय को एक रिपोर्ट भेज कर बताया था कि 514 ग्रामीण युवकों को पुराने जेल परिसर में कोबरा बटालियन की निगरानी में रखा गया है। युवकों को क्यों रखा गया है, किसके आदेश पर रखा गया है, यह स्पष्ट नहीं है। एम.वी. राव की रिपोर्ट पर पुलिस मुख्यालय ने मामले की जांच करायी। जांच में पाया गया कि यह युवकों को नक्सली बताकर फर्जी तरीके से सरेंडर कराने का मामला है। जिसके बाद लोअर बाजार थाना में मामले की प्राथमिकी दर्ज की गयी।

सीआरपीएफ(झारखंड क्षेत्र) के तत्कालीन आईजी एम. वी. राव की रिपोर्ट से हुआ था फर्जीवाड़े का खुलासा

इस मामले के उजागर होने के बाद ही झारखंड के पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। वर्ष 2014 में तत्कालीन हेमंत सोरेन सरकार ने मामले की सीबीआई जांच की अनुशंसा की थी। सीबीआई ने जांच शुरु करने पर मंजूरी भी दे दी थी। सीबीआई के द्वारा झारखंड पुलिस मुख्यालय को पत्र लिख कर अनुरोध किया गया था कि मामले की जांच में सहयोग के लिए राज्य पुलिस से कुछ अफसरों की प्रतिनियुक्ति सीबीआई में की जाये। क्योंकि सीबीआई में अफसरों की कमी है। झारखंड पुलिस ने सीबीआई को पुलिस अफसर देने से इंकार कर  दिया था। जिस कारण जांच शुरु नहीं हो सकी थी। वर्ष 2015 में यह मामला विधानसभा में जोर-शोर से तब उठा, तब रघुबरदास सरकार ने विधानसभा में आश्वासन दिया था कि वह सीबीआई जांच की अनुशंसा दुबारा करेगी। लेकिन 2017 में रघुबरदास सरकार ने इस मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की। उसने सीबीआई जांच की अनुशंसा को वापस ले लिया और कहा कि इस मामले की जांच राज्य पुलिस अपने स्तर से कर सकती है।

आत्मसमर्पण करते नक्सली (प्रतीकात्मक चित्र)

यह इकलौता उदाहरण है जब किसी राज्य सरकार ने किसी मामले को सीबीआई को सौंपने की अनुशंसा की और उसकी अनुशंसा के बाद सीबीआई ने मंजूरी दे दी हो तब राज्य सरकार मामले को वापस लेने की बात कहे। लेकिन झारखंड की रघुबरदास सरकार ने ऐसा किया।

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबरदास

रघुबरदास सरकार के इस फैसले पर सवाल उठना लाजमी था। मामले की जांच को लेकर रांची पुलिस पर लापरवाही बरतने का भी आरोप लगते रहे हैं। मसलन इसी मामले में आरोप है कि रांची पुलिस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उस रिपोर्ट पर गौर ही नहीं किया, जिसमें कहा गया था कि पुलिस के सीनियर अफसरों ने सरेंडर का आंकड़ा बढ़ाने के लिए नक्सली सरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग किया है। इस मामले को लेकर ”झारखंड डेमोक्रेटिक संस्था” की ओर से झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी थी। जनहित याचिका को संज्ञान में लेते हुए कोर्ट ने झारखंड सरकार और प्रशासन कई बार फटकार भी लगा चुका है।

इस मामले में जनहित याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजीव कुमार ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में बताया, “9 जनवरी 2018 को हुई सुनवाई के दौरान सरकार के महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि नक्सलियों को सरेंडर कराने की योजना केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशन में बनायी गयी थी। इसमें सीआरपीएफ व राज्य पुलिस शामिल थी।  इस पर कोर्ट ने सरकार से 29 जनवरी 2018 तक जवाब मांगा। कोर्ट ने कहा था कि अगर केंद्रीय गृह मंत्रालय के स्तर से ऐसी योजना बनायी गयी थी तो इससे संबंधित दस्तावेज 29 जनवरी 2018 तक उपलब्ध कराये जायें। इतना ही नहीं कोर्ट ने पूरे मामले की जांच और कार्यशैली पर संदेह व्यक्त करते हुए रांची पुलिस से कहा था कि किसी सरकारी आदेश पर भी गलत काम को जायज नहीं ठहराया जा सकता। इसके अलावा कोर्ट ने मामले की जांच कर रही रांची पुलिस से कहा कि अभी तक सिर्फ धोखाधड़ी के बिंदु पर जांच की गयी है। इस पूरे प्रकरण में सीनियर अफसरों की भूमिका की जांच करके 29 जनवरी तक रिपोर्ट दें। बता दें कि सुनवाई के दौरान कोर्ट में सिटी एसपी अमन कुमार भी उपस्थित थे। मगर रांची पुलिस द्वारा जनवरी के बाद भी कोर्ट को कोई रिपोर्ट नहीं दी गई।”

झारखंड हाई कोर्ट, रांची

हाई कोर्ट में पुन: इस फर्जी नक्सली सरेंडर मामले पर 12 जुलाई को सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश अपरेश कुमार सिंह और जस्टिस रत्नाकर भेंगरा की बेंच ने इस मामले में राज्य सरकार के रवैये पर असंतुष्टि जताते हुए रघुवर सरकार के गृह सचिव को 7 अगस्त तक जवाब देने  का आदेश दिया। साथ ही यह भी कहा कि अगर सात अगस्त तक जवाब पेश नहीं होता है, तो सरकार के गृह सचिव को हाजिर होना होगा।

अधिवक्ता राजीव कुमार ने कोर्ट से कहा कि सुनवाई को लंबित रखने के तमाम प्रयास किये गये। सुनवाई के लिए चार तारीखें मुकर्रर की गयीं,  लेकिन सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया। वे बताते हैं कि वर्ष 2019 में चुनाव होने वाला है। शायद सरकार की मंशा है कि तब तक इस मामले को लटका कर रखा जाए। ताकि इस मामले से संबंधित कई अधिकारी रिटायर हो जाएंगे। मामले को लेकर कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की थी और गृह सचिव को हाजिर होने को कहा था।

बहरहाल, आगामी 2 नवंबर 2018 को हाई कोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगा कि 2013 में 514 आदिवासी युवकों को फर्जी तौर पर नक्सली बताने के मामले की जांच सीबीआई करेगी या नहीं। फिलहाल सबकी निगाहें हाई कोर्ट की ओर है।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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