सबरीमाला : परम्परा का तांडव

वास्तव में रूढ़िवाद और प्रगतिशीलतावाद के बीच संघर्ष तेज हो गया, और पूरे देश में फ़ैल गया, तो फिर हिन्दू राष्ट्रवाद की चिंदी-चिंदी उड़ जाएगी। क्योंकि फिर यह संघर्ष मन्दिर तक सीमित नहीं रहेगा। उसकी चपेट में बहुत कुछ आएगा, स्त्री-शूद्रों के जागरण के मुद्दे भी आएंगे, जिन पर आरएसएस बात करना नहीं चाहता, क्योंकि वे मुद्दे उसके वजूद के लिए खतरा हैंI बता रहे हैं कंवल भारती :

हिन्दू धर्म दुनिया का एक मात्र धर्म है, जिसमें ‘स्त्रीशूद्रोनधीयताम’ की श्रुति (परम्परा) है, जिसका अर्थ है, स्त्रियों और शूद्रों को शिक्षा नहीं देनी चाहिए यह अकेली श्रुति नहीं है, बल्कि ऐसी और भी बहुत सी श्रुतियां हैं, जो अनेक मन्दिरों और अनुष्ठानों में स्त्री-शूद्रों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगाती हैं।  बहुत सारी क्रूर और हैवानियत भरी परम्पराओं को अंग्रेज शासकों ने कानून बनाकर खत्म किया था।  ‘स्त्रीशूद्रोनधीयताम’ की श्रुति को सबसे पहले अंग्रेजों ने शिक्षा को सार्वजनीन बनाकर तोडा था।  इसी के तहत स्त्री-शूद्रों के लिए भारत का पहला स्कूल महाराष्ट्र में शूद्र वर्ण के जोतीराव फुले ने खोला था, किसी ब्राह्मण ने नहीं। तब ब्राह्मणों ने स्त्री-शूद्रों की शिक्षा का विरोध किया था, और जोतीराव फुले तथा उनकी पत्नी सावित्री फुले पर, जो भारत की पहली महिला शिक्षिका भी थीं, हमले किए थे। यह पूरी दुनिया के लिए आश्चर्य की बात हो सकती है कि हजारों साल की अपनी परम्परा पर गर्व करने वाले ब्राह्मणों ने अंग्रेजों के आने तक एक भी स्त्री-शूद्र को शिक्षित नहीं किया था। लेकिन जब अंग्रेजों ने शिक्षा के दरवाजे सबके लिए खोले, तो उसका लाभ इन्हीं ब्राह्मणों और जमींदारों ने उठाया था। उस जमाने की हिंदी पत्र-पत्रिकाओं को उठाकर देख लीजिए, उनमें बड़े गर्व के साथ मैट्रिक और स्नातक करने वाली स्त्रियों के सचित्र विवरण छपा करते थे।  

मानवीय भेदभाव की ऐसी परम्पराएं अन्य भारतीय धर्मों—जैन, बौद्ध और सिख धर्म में नहीं मिलती हैं। इन धर्मों के मन्दिरों में स्त्रियों और शूद्रों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध नहीं है। लेकिन हिन्दू धर्म में आज भी अनेक मन्दिरों में स्त्री-शूद्रों का प्रवेश वर्जित है। इन्हीं में केरल का सबरीमाला मन्दिर है, जिसमें रजस्वला वाली दस से पचास साल की उमर की स्त्रियों का प्रवेश प्रतिबंधित है। भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने इस परम्परा को संविधान में दिए गए स्वतंत्रता के अधिकार का हनन माना और उसे खत्म कर दिया। इससे उन महिलाओं के संघर्ष को विजय मिली, जो वर्षों से भगवान अयप्पा के दर्शन करने के लिए आन्दोलन-रत थीं। परम्पराएं शाश्वत और अजर-अमर नहीं होतीं, वे समय के साथ टूटती-बनती रहती हैं। इतिहास में न जाने कितनी परम्पराएं टूटीं और न जाने कितने मन्दिर और अनुष्ठान कालकलवित होकर इतिहास में दफन हो गए। भगवान अयप्पा की परम्परा को भी टूटना ही है, आज नहीं तो कल।

सबरीमाला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के समर्थन में सड़क पर उतरे लोग। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इस प्रतिबंध को समाप्त कर दिया है

लेकिन परंपरा का जो हिंसक तांडव केरल में चल रहा है, उसे समझिए। वह स्वत: स्फूर्त नहीं है, बल्कि प्रायोजित है। उसे ऑक्सीजन आरएसएस दे रहा है, जो वहां हिन्दू रूढ़िवाद की जमीन तैयार करके भाजपा को सत्ता में लाना चाहता है। मन्दिर-मस्जिद के मुद्दे आरएसएस के सबसे प्रिय मुद्दे हैं, क्योंकि उसका तथाकथित हिन्दू राष्ट्र इन्हीं मुद्दों से बाहर निकलता है। लेकिन केरल में वह निश्चित रूप से मुंह की खायेगा, क्योंकि, जैसा कि भाजपा के हिन्दू नेता सुब्रमणियम स्वामी ने कहा है कि यह रूढ़िवाद और प्रगतिशीलतावाद के बीच संघर्ष है।

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हिन्दू समाज में रूढ़िवाद और प्रगतिशीलवाद के बीच संघर्ष इतना ज्यादा और इतनी बार हुआ है कि ब्राह्मणवाद अनेक बार मरणासन्न स्थिति में पहुंच गया था। बुद्ध की क्रांति ने तो उसे इतने गहरे रसातल में पहुंचा दिया था कि अगर वह खुद को पुन: जीवित करने के लिए क्षत्रिय राजाओं के आगे घुटने टेक कर समझौता न करता, और अपने देवताओं को हाशिए पर डालकर क्षत्रिय नायकों को अपना देवता न बनाता, तो वह कभी भी रसातल से बाहर नहीं निकल पाता। क्या आरएसएस चाहता है कि रूढ़िवाद और प्रगतिशीलतावाद के बीच संघर्ष तेज हो, जो बीसवीं सदी के आरम्भ में बाबा साहेब के महाड़ और नासिक सत्याग्रहों के बाद समाप्त सा हो गया है?

केरल का सबरीमाला मंदिर

अगर वास्तव में रूढ़िवाद और प्रगतिशीलतावाद के बीच संघर्ष तेज हो गया, और पूरे देश में फ़ैल गया, तो फिर हिन्दू राष्ट्रवाद की चिंदी-चिंदी उड़ जाएगी। क्योंकि फिर यह संघर्ष मन्दिर तक सीमित नहीं रहेगा, उसकी चपेट में बहुत कुछ आएगा, स्त्री-शूद्रों के जागरण के मुद्दे भी आएंगे, जिन पर आरएसएस बात करना नहीं चाहता, क्योंकि वे मुद्दे उसके वजूद के लिए खतरा हैं।

केरल के सबरीमाला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को लेकर प्रदर्शन करते आरएसएस के सदस्य

क्या केरल का संघर्ष, जैसा कि सुब्रमणियम स्वामी कह रहे हैं, रूढ़िवादियों और प्रगतिशील लोगों के बीच है? नहीं, बिल्कुल नहीं। यह संघर्ष, वास्तव में रूढ़िवादियों के बीच ही है। जो स्त्रियां भगवान अयप्पा के दर्शन करने से स्त्रियों को डंडे के बल पर रोक रही हैं, वे निश्चित रूप से रूढ़िवादी हैं, परन्तु जो स्त्रियां भगवान अयप्पा के दर्शन करने जा रही हैं, या करना चाहती हैं, वे भी रूढ़िवादी हैं, बल्कि वे रोकने वालों से भी बड़ी रूढ़िवादी हैं। क्योंकि वे यह बात समझने में असमर्थ हैं कि जो देवता स्त्रियों को देखने मात्र से अपने को असुरक्षित महसूस करता हो, उसमें कुछ भी देवत्व नहीं है। परम्परावादी लोग परम्परा को सुरक्षित रखना चाहते हैं, इसलिए रूढ़िवादी हैं, और परम्परा-भंजक लोग इसलिए रूढ़िवादी हैं, क्योंकि वे प्रगतिशील नहीं हैं, मन्दिर में अपनी मुक्ति समझते हैं। और परम्परा-भंजन हमेशा सुधारवाद नहीं होता।

वर्ष 1930 में नासिक के कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर सत्याग्रह के दौरान डॉ. आंबेडकर

यहां डा. आंबेडकर के मन्दिर आंदोलन का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। नासिक में दलितों को कालाराम मंदिर में प्रवेश और राम का रथ खींचने का अधिकार नहीं था। इस अधिकार को प्राप्त करने के लिए डा. आंबेडकर के नेतृत्व में एक बड़ा सत्याग्रह किया गया और तय किया गया कि रथयात्रा के दिन दलित भी रथ के रस्से को खींचेंगे और मन्दिर में प्रवेश करेंगे। यह खबर जंगल में लगी आग की तरह चारों और फ़ैल गई। परम्परावादी हिन्दू किसी भी कीमत पर दलितों के प्रवेश के खिलाफ थे, जबकि सुधारवादी हिन्दू पक्ष में थे। रथयात्रा वाले दिन जबर्दस्त संघर्ष हुआ, और निहत्थे दलितों पर रूढ़िवादियों ने लाठी-डंडों से हमला कर दिया, जिसमें डा. आंबेडकर का भी सिर फटा था। लेकिन परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणों ने अनिश्चित काल के लिए मन्दिर के कपाट बंद कर दिए और रथयात्रा स्थगित कर दी गई। हालांकि, दलितों का सत्याग्रह भी स्थगित कर दिया गया था, परन्तु बंद नहीं किया गया था। बाद में डा. आंबेडकर ने उस सत्याग्रह को बंद करते हुए कहा था कि उसकी अब आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा था कि यह सत्याग्रह दलितों को यह बोध करने के लिए शुरू किया गया था कि हिन्दू धर्म और समाज में उनकी क्या स्थिति है? यह आंदोलन उन्हें यह अहसास कराने में पूरी तरह सफल हुआ है। मन्दिर हमारा लक्ष्य नहीं है, हमारा लक्ष्य शासन-प्रशासन में भागीदारी प्राप्त करना है। हमें अपने मानक राजनीति से तय करने हैं, न कि मन्दिर से। उन्होंने कहा था कि हमें मन्दिर के पाखंड से दूर रहकर अपने आपको शिक्षित बनाना है, शिक्षा में ही हमारी मुक्ति है।  उन्होंने कहा था कि जो हिन्दू हमें मन्दिर में प्रवेश का अधिकार नहीं दे सकते, वे हमें राजनीति में अधिकार कैसे दे सकते हैं? इसलिए हमारा आन्दोलन अब राजनीतिक होना चाहिए।

1930 में नासिक, महाराष्ट्र के कालाराम मंदिर सत्याग्रह के दौरान हुई हिंसा की तस्वीर

केरल में सबरीमाला मन्दिर में प्रवेश के संबंध में क्या कोई ऐसा नेतृत्व नहीं उभरना चाहिए, जो डा. आंबेडकर की तरह लोगों को जागरूक करे, उन्हें यह बोध कराए कि जिस धर्म में ‘स्त्रीशूद्रोनधियातम’ की श्रुति हो, वह स्त्री-शूद्रों का कोई उत्थान कैसे कर सकता है; जो उन्हें मन्दिर से शिक्षा के मार्ग पर ले जाए और अयप्पा जैसे भगवानों के लिए उन्हें भेड़-बकरियां बनने से रोक सके? इस क्रान्ति की उम्मीद उस नेतृत्व से तो कतई नहीं की जा सकती, जो केरल में परम्परा का तांडव करा रहा है, और इसी तांडव के लिए वहां सत्ता में आना चाहता है। यह उम्मीद केरल की वाम सरकार से भी नहीं की जा सकती, क्योंकि उसे भी वोट चाहिए।  वोट की राजनीति से कभी क्रांति नहीं होती है। किन्तु अगर रूढ़िवाद और प्रगतिवाद के बीच निर्णायक संघर्ष देश में आरम्भ हो गया, तो निश्चित ही उसके नतीजे सकारात्मक निकलेंगे।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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