सवर्ण बदलें अपना नजरिया, नहीं तो #MeToo अभियान बेमानी

आज मैं जानना चाहती हूं कि क्यों सवर्ण भारतीय यह नहीं चाहते कि कोई दलित महिला उनका प्रतिनिधित्व करे। यहां तक ​​कि वह महिला भी जो उनके लिए अजनबी है और ऐसी महिला भी जो विशेष तौर पर दलित मुद्दों पर काम नहीं करती है। कोई नहीं कहता कि लिएंडर पेस ईसाई हैं और कल्पना चावला हरियाणवी थीं। #MeToo अभियान के बरक्स दलित और दलित महिलाओं का पक्ष रख रही हैं मिमि मंडल

#MeToo अभियान को लेकर एक दलित महिला के विचार

एलजीबीटीक्यू अधिकारों के लिए स्टोनवाल संघर्ष 1960 में दो ट्रांस  महिलाओं, मारशा पी. जॉन्सन और सिल्विया रिवेरा द्वारा शुरू किया गया था।

वहीं #MeToo अभियान 2007 में  महिला कार्यकर्ता टाराना बुर्क द्वारा यौन उत्पीड़न के खिलाफ  चलाया गया था।

मीडिया द्वारा भारत में कार्य स्थलों पर यौन उत्पीड़न का खुलासा 2017 में तब हुआ जब दलित महिला राय सरकार ने अपनी चुप्पी तोड़ी। 

परंतु यह अभियान पिछले ही महीने भारत में स्पष्ट रूप से उभर के सामने आया है।

आपने इन आंदोलनों के बीच क्या समानताएं देखीं?

मैं अनंत चीजों के बारे में बात कर सकती हूं। लेकिन मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से शुरूआत करना चाहूंगी।

मैं विज्ञान कथा और फंतासी  लेखिका हूं। यह साहित्य की एक शैली है जो भारत में अपने छोटे विशिष्ट समुदायों के बाहर बहुत लोकप्रिय नहीं है। मैं सालों से लेखन कार्य कर रही हूं, लेकिन मुझे इस साल की शुरुआत में व्यापक स्तर पर स्वीकृति तब मिली जब मैं प्रतिष्ठित ह्यूगो पुरस्कार के लिए मनोनीत हुई। मैं पहली भारतीय हूं जिसे यह सम्मान मिला।

भारत में चलाया जा रहा #MeToo अभियान

देश के पहले व्यक्ति के रूप में  कुछ हासिल करना अत्यधिक गर्व की बात है। लेकिन मुझे तुरंत ही भारत के विज्ञान कथाकार समुदाय के एक हिस्से की तीखी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा। “यही क्यों?” इस दलित महिला को यह सम्मान क्यों मिला? इसे मुख्यधारा की मीडिया में खबर नहीं बनाई गई, क्योंकि विज्ञान कथा की दुनिया की गतिविधियां अक्सर भारत में सुर्खियां नहीं बनती हैं। मैं अपने ही देश में अपमानजनक बातें सुन नही हूं। वह भी, उनसे जो मेरी तरह ही लिखते-पढ़ते हैं।

हम उसे पसंद नहीं करते। वह हमारा प्रतिनिधित्व नहीं करती है; उसने यह उपलब्धि धोखे से पायी है। वह लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करवाना चाहती है।  वे लोग भी मेरी निंदा कर रहे थे जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से जानती तक नहीं। जिन्होंने कभी मेरे साथ काम नहीं किया, ना ही जिनकी कभी मेरे साथ बातचीत हुई। हालांकि इनमें से किसी के भी व्यवहार से मैं अपरिचित नहीं हूं।

आज मैं जानना चाहती हूं कि क्यों सवर्ण भारतीय यह नहीं चाहते कि कोई दलित महिला उनका प्रतिनिधित्व करे। यहां तक ​​कि वह महिला भी जो उनके लिए अजनबी है और ऐसी महिला भी जो विशेष तौर पर  दलित मुद्दों पर काम नहीं करती है? कोई नही कहता कि लिएंडर पेस ईसाई हैं और कल्पना चावला हरियाणवी थीं। इसलिए वे हमारा हमारा प्रतिनिधित्व नहीं करते। राय सरकार ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का मामला केवल दलित महिलाओं के संदर्भ में नहीं उठाया था, उसमें सवर्ण महिलाएं भी शामिल थीं। यदि  सवर्ण भारत #MeToo आंदोलन को व्यापक बनाना चाहता है, तो उसे यौन उत्पीडऩ के व्यापक दायरे को अपने भीतर समेटना होगा।

#MeToo अभियान से संबंधित एक सोशल मीडिया पर जारी एक बैनर

#MeToo आंदोलन हम दलित महिलाओं को क्या संदेश देता है?

जो सन्देश यह हमें देता है वह वही सन्देश है जो हमारी मांयें और दादियां पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे कानों में चुपके से बताती रही हैं। यह वही सन्देश है जिसको सुनने से शेष भारत ने न केवल इंकार कर दिया है, बल्कि जान-बूझकर चुप्पी साध ली है।

पीढ़ी दर पीढ़ी भारत में दलितों को पूरी ताकत लगाकर बोलने से रोका गया है। यह गजब की सांठ-गांठ है। जातिवादी लोग हमें पूरी तरह से मानव भी नहीं मानते हैं, और वह लोग जो जाति विरोधी होने का नाटक करते है वो हमें ज़बरदस्ती चुप करवा देते हैं।

हर बार जब भी कभी हम अपने अनुभवों के आधार पर कोई बात रखने का प्रयास भी करते हैं, तब उदार सवर्ण हमें यह कहते हुए रोक देते हैं कि हम जाति में विश्वास नहीं करते। आप के पास कोई अलग अनुभव नहीं है! आप सिर्फ लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं! वे हमें डांटकर चुप करा देते हैं। जब हम आंदोलन के भीतर अपनी आवाज उठाने की कोशिश करते हैं तब हमें बताया जाता है कि हम ‘विभाजक’ होने की कोशिश कर रहे हैं और कहा जाता है कि ‘यह सही सही समय नहीं है।’

राय सरकार : जिन्होंने 2017 में की भारत में #MeToo अभियान की शुरुआत

हमारी मांओं ओर दादियों ने हमें यही सिखाया है। भारत में हमारे साथ होने वाले उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने के लिए कभी ‘सही समय’ नहीं होता है। ऐसे आंदोलन और विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं जो सवर्णों को लाभ देते हैं और जो कुछ थोड़ा बहुत भी हम उनसे प्राप्त कर सकते हैं, उन्हें प्राप्त कर लेते है, लेकिन हमें क्या नही मिला, यह बोलने का अधिकार नहीं है हमारे पास। हमारे द्वारा की गई किसी भी शुरूआत का स्वागत नहीं होता, क्योंकि हम आपका प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, हम इंसान नहीं, केवल एक मूक संख्या हैं, जिन्हें आप दबा सकते हैं, अनदेखा कर सकते हैं या फिर आप अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

मैं आपको ‘विशेषाधिकार प्राप्त दलित’ होने के  मिथक के बारे में बताती हूं। पारंपरिक रूप से सवर्ण उस  दलित को बर्दाश्त नहीं कर सकते जो बोल सकता है। उनके मुताबिक वह व्यक्ति ‘वास्तविक दलित’ नहीं है। इसलिए वे सभी दलित जो सुशिक्षित, अपने को सशक्त तरीके से व्यक्त करने वाले और जिनके पास पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा हों, उनमें से केवल कुछ ही हैं जिनके पास अपनी आवाज़ उठाने और सवर्ण विरासत की आलोचना करने की शक्ति और कौशल है। ऐसे लोगों को बोलने से रोक दिया जाता है।

चाहे वह राय हों या मीना या क्रिस्टिना या थेनमोज़ही या सुजाता या फिर मैं स्वयं भी, उदारवादी सवर्णों के पसंद के ‘सही’ दलित नहीं हैं। ‘वास्तविक दलित’ वह शरीर है, जो पेड़ से उतारा गया है या सीवर से निकाला गया है, जो अब चीख नहीं रहा है।

मैं जानना चाहती हूं कि यह देश दलित महिलाओं को क्या संदेश देना चाहता है जब जातिवादी अपने उदारवादी नारीवादी विमर्श का नेतृत्व करने से दूर भाग रहे हैं? यह देश हमसे क्या बताता है, जब हमें किसी भी तरह का भेदभाव का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमें इसका उल्लेख करने की अनुमति नहीं है, जबतक हम ‘जाति प्रमाण-पत्र” नामक कागज के कुछ अनावश्यक टुकड़े पेश नहीं करते। वह देश जहां आधी से ज्यादा आबादी के पास जन्म प्रमाण-पत्र या मतदाता प्रमाण-पत्र नहीं है। वही नौकरशाही व्यवस्था जो भ्रष्टाचार और लाल फीताशाही में संलिप्त है, ऐसे कागजी दस्तावेज उपलब्ध कराती है। यह देश हमें क्या बताता है, जब सवर्ण महिलाएं और सवर्ण मीडिया वह आंदोलन मिटा देता है, जो हममें से किसी ने एक खड़ा किया है। जिसने अकेले ही यह करने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर खुद को जोखिम में डाला है, सिर्फ दलित महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि खुद का एक और आंदोलन बनाने के लिए? क्या यह बताता है कि देश हमारी चिंताओं और सुरक्षा की परवाह करता है?

#MeToo आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह एक विश्वास पर खड़ा किया गया है। एक ऐसी महिला जिसके पास उसके दुर्व्यवहार करने वालों की तुलना में बहुत कम शक्ति होती है और प्रायः कोई दस्तावेज नहीं है जो अदालत में मदद करेगा, वह जनता के सामने इस विश्वास के साथ आती है कि लोग उसके अनुभव पर विश्वास करेंगे। जब उस आदमी की स्थिति के खिलाफ उस महिला की बात आती है तो लोग महिला के शब्दों पर विश्वास करेंगे।

यह भी पढ़ें : ‘भारत माता’ और उसकी बगावती बेटियाँ

अगर लोग उस विश्वास को आगे नहीं बढ़ाते हैं तो पूरी प्रक्रिया उन महिलाओं पर उलटी पड़ जाएगी जो संभवतः जीवन के लिए व्यक्तिगत और पेशेवर सुरक्षा खोने का जोखिम उठाती हैं।

हम दलितों और विशेष रूप से दलित महिलाएं सवर्ण सामाजिक व्यवस्था में इस तरह का विश्वास पाने की उम्मीद नहीं रखते हैं। यहां तक ​​कि हमें अपने सवर्ण दोस्तों से भी इस तरह के विश्वास की उम्मीद नहीं होती है। आपने हमेशा हमें बताया है कि हमारे अनुभव झूठे, गलत, विभाजक, ध्यान आकर्षित करने के लिए हैं। इसे जानने के लिए किसी को कार्यकर्ता या विद्वान नहीं होना चाहिए। हमारी मां और दादियों ने हमें चेतावनी दी है क्योंकि उन्हें बार-बार विश्वासघात प्राप्त हुआ है और उन्हें आपके समाज में आपके बगल में रहने की भी इजाजत केवल इसलिए है क्योंकि उन्होंने चुप्पी साध ली है।

हम आपके संकट में आपके साथ होते हैं और फिर जब आपका काम हो जाता है आप हमें निराश करके चुप होने के लिए बोल देते हैं| आपने हमें कभी भी दुर्व्यवहारियों से बचाया नहीं है, बल्कि खुद को बचाने के लिए उनके सामने हमें आगे किया  है। हम आप पर भरोसा नहीं करते हैं।

मेरे पास भी  #MeToo की कहानी  है, लेकिन भारत का सवर्ण समाज इसे नहीं सुन पाएगा। मैं आपको वह दर्द और वह सदमा नही बताउंगी जिसके साथ मैं अब भी रोज़ जी रही हूं। केवल यह देखने के लिए कि आप अपने आप में से एक के लिए सुरक्षात्मक घेरा  बना देते और मुझे झूठा कह देते हैं। मैं आपके गंदे उदार नारीवादी और उनके समर्थकों के मनोरंजन के लिए अपने जाति प्रमाण पत्र और मेरे माता-पिता और रिश्तेदारों और पूर्वजों की विस्तृत कहानियां प्रस्तुत नहीं करूंगी। मैं अपनी शिक्षा अपनी पेशागत विश्वसनीयता, अपना रोमानी इतिहास, अपनी हर एक उपलब्धि जिसके लिए मुझे आपके प्रतिबिंब और उपहास के खिलाफ बार-बार संघर्ष करना पड़ा, उन्हें आपके घेरे में नही आने दूंगी। मैं आपको एक बार फिर ध्यान खींचने वाली की लेबल लगाने का मौका नहीं दूंगी।

यदि आप वास्तव में दलित महिलाओं को अपने आंदोलन में शामिल करना चाहते हैं तो सवर्ण भारत  को बेहतर करना होगा।

(यह लेख सबसे पहले इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ था। यहां इसका हिंदी अनुवाद लेखिका की अनुमति से प्रकाशित किया गया है)

(अनुवाद : अलख निरंजन, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क) 


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। हमारी किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्कृति, सामाज व राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के सूक्ष्म पहलुओं को गहराई से उजागर करती हैं। पुस्तक-सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply