अलविदा जॉर्ज फर्नांडिस

मशहूर मजदूर नेता, समाजवादी राजनेता, पत्रकार और सांसद जॉर्ज फर्नांडिस आज दिवंगत हो गए। वह कई वर्षों से विस्मृति के शिकार हो, बिछौने पर पड़े थे। उनके व्यक्तित्व और राजनीतिक यात्रा के उतार-चढ़ावों को याद करे रहे हैं प्रेमकुमार मणि

मशहूर मजदूर नेता, समाजवादी राजनेता, पत्रकार और सांसद जॉर्ज फर्नांडिस आज दिवंगत हो गए। वह कई वर्षों से विस्मृति के शिकार हो, बिछौने पर पड़े थे, लगभग अटल जी की तरह। इसलिए कहा जाना चाहिए कि आज उनका देहावसान हुआ है, स्मृतिलोप तो वर्षों पूर्व हो चुका था।

आपातकाल के दौरान गिरफ्तार जॉर्ज फर्नांडिस

3 जून 1930 को जॉन जोसफ फर्नांडिस और ऐलिस मार्था के घर कर्नाटक के मंगलौर में जन्मे जॉर्ज के पिता उन्हें पादरी बनाना चाहते थे, लेकिन इस पढ़ाई में उनका मन नहीं लगा। वे घर से भागकर मुंबई पहुंचे। मुंबई में पहली रात का ब्यौरा उन्होंने स्वयं मुझे बतलाया था कि कैसे जब वह फुटपाथ पर सोये थे, तब उन्हें एक लात पड़ी कि बे उठ! यह मेरी जगह है। इस तरह मुंबई ने उनका स्वागत किया था। लेकिन इस शहर ने उन्हें दिया भी बहुत। वह टैक्सी ड्राइवर बने। फिर ड्राइवरों के नेता। वहीं समाजवादी बने। राममनोहर लोहिया से संपर्क हुआ और फिर उनके सहयोगी के रूप में अरसे तक सक्रिय रहे। 1967 में मुंबई के बेताज के बादशाह एस.के. पाटिल को हराकर लोकसभा पहुंचे और युवा संघर्ष के प्रतीक बने। 21 जुलाई 1971 को हुमायूं कबीर की बेटी लैला कबीर से विवाह किया। प्रतिपक्ष नाम से एक पाक्षिक समाचार पत्र निकाला। 1974 में रेल मजदूरों की व्यापक हड़ताल के नेता बने और देश के सर्वाधिक मशहूर व जुझारू मजदूर नेता बन गए। जयप्रकाश आंदोलन में सक्रिय हुए और इमरजेंसी लगने पर कुछ वैसी भूमिका अपनाने की कोशिश की जैसी 1942 के आंदोलन के वक्त जेपी और लोहिया ने अपनाई थी। व्यक्तिगत रूप से मैं इस विचार का विरोधी हूं, लेकिन जॉर्ज ने तब सरकार के खिलाफ एक उखाड़-पछाड़ योजना बनाई थी। नतीजतन बड़ौदा डायनामाइट काण्ड में वह पकड़े गए। 1977 में बिहार के मुजफ्फरपुर से लोकसभा के लिए चुने गए और जनता सरकार में उद्योग मंत्री बनाए गए। 1980 से 1990 के बीच वह संसद में नहीं रहे। कई चुनाव हारे और राजनीतिक रूप से भी कुछ ऐसा नहीं किया, जो उल्लेखनीय हो। दशक के आखिर में चुपचाप नवनिर्मित जनता दल के हिस्सा बन गए।

अपने कार्यालय में काम करते जॉर्ज फर्नांडिस

1990 में वह विश्वनाथ प्रताप सरकार में रेल मंत्री बने और 1994 में जनता दल से अलग हो समता पार्टी का गठन किया। 1996 में भाजपा के साथ मिलकर राजनीति की नई पारी शुरू की और बाद के समय में भाजपा के संकटमोचक के रूप में काम करना पसंद किया। 1998 से 2004 तक अटल बिहारी मंत्रिमंडल में रक्षा मंत्री बने रहे। 1999 में पादरी ग्राहम स्टेंस और उनके बच्चों को जिन्दा जला दिए जाने की घटना पर प्रतिक्रिया और 2002 के गोधरा काण्ड के बाद संसद में उनके वक्तव्य से उनका एक नया ही चेहरा प्रकट हुआ। यह अमानवीय और गैर- जिम्मेदार वक्तव्य था। इसी बीच कॉफिन मामले में भी उन पर ऊंगली उठी। कुल मिलाकर उनकी फजीहत हो गई। 2004 का चुनाव तो वह किसी तरह जीत गए, लेकिन 2009 में उनकी राजनीतिक हस्ती ऐसी हो गई कि उनकी पार्टी ने ही उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया। हालांकि, साल भर बाद कुछ समय के लिए वह राज्यसभा भेजे गए। यह उनकी अंतिम पारी थी। अब तक वह स्मृति लोप के शिकार हो गए थे और सार्वजनिक जीवन से अलग होना मजबूरी हो गई थी। आज सांसें थमने तक वह सार्वजनिक जीवन से बिलकुल अलग-थलग थे।

(बाएं से) जॉर्ज फर्नांडिस, राम बहादुर राय, लालकृष्ण आडवाणी एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी

जॉर्ज साहब के साथ कुछ समय गुजारने का अवसर मुझे भी मिला है। कह सकता हूं कि उनका स्नेह-भाजन भी रहा; लेकिन मेरे दिल में उनके लिए सम्मान कभी नहीं बन पाया। वह विलक्षण प्रतिभाशाली थे। कई भाषाएं (हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, कन्नड़ आदि ) धाराप्रवाह बोल सकते थे। भाषा के प्रति उनका विलक्षण अनुराग था और जब हिंदी भी लिखते-बोलते थे, तब उनका एक अपना ही अंदाज होता था। समय के बहुत पाबंद और सादगी का तो कहना ही नहीं। उनका आवास भी वैसा ही सादा। सब कुछ खुला-खुला। उनके बैडरूम में कोई भी जा सकता था। उनके यहां जब भी खाने का अवसर मिला। भोजन की भी वही सादगी।

देश के रक्षामंत्री के रूप में जॉर्ज फर्नांडिस

लेकिन यह सादगी विचारों की नहीं थी। उनके विचारों में पेंचो-खम होते थे। उनके समाजवाद पर मुझे संदेह रहा, आज भी है। भारतीय लोकायत दर्शन के वह अच्छे जानकार थे। इस विषय पर उनसे एक दफा लंबी चर्चा हुई थी। तब सुप्रसिद्ध समाजसेवी और नास्तिक विचारक रामचंद्र गोरे की पुत्री भी थीं। उनकी वैचारिक सारणी में कोई उलझाव नहीं था। मार्क्सवाद के महत्व को भी वह स्वीकारते थे। लेकिन उनके अंध कम्युनिस्ट विरोध को मैं समझ नहीं पाया। वह कम्युनिस्टों को भाजपाइयों से अधिक खतरनाक समझते थे। इस रूप में मुझे संदेह होता था कि वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर के किसी वैचारिक गिरोह से तो नहीं जुड़े हैं। लेकिन यह एक आवारा-अनुमान भर है।

मुझे यह भी लगता है कि 1980 के बाद देश में समाजवाद की नई प्रवृत्तियां उभरने लगी थीं। इस बीच कर्पूरी ठाकुर ने गांधीवाद से अलग हो आंबेडकरवाद में दिलचस्पी लेनी शुरू की। ख्यात समाजवादी मधु लिमये ने आंबेडकर पर नए सिरे से विमर्श किया और लेखों की शृंखला लिखी, जो अब पुस्तक रूप में विद्यमान है। लिमये ने तो स्वयं को संसदीय राजनीति से अलग ही कर लिया था। लिमये पर लिखे एक लेख में जॉर्ज ने इस बात को स्वीकारा है कि उस समय मुझे भी राजनीति से अलग हो जाना चाहिए था। यदि ऐसा होता तो जॉर्ज का एक नया रूप ही हमारे सामने होता। वह आखिरी दिनों में उदासी में डूबे होते थे। 1995 में समता पार्टी के घोषणापत्र का इंट्रो उन्होंने बोलकर लिखवाया और उसकी पहली पंक्ति थी- “बिहार के लोग देश के सब से उदास जन हैं।”  उदास मौसम, उदास चेहरा, उदास दिल, उदास हाल वह अक्सर बोलते थे। यह बहुत कम लोग जानते हैं कि आंदोलन का बंद उनका ही सृजित शब्द है। पहली दफा उन्होंने मुंबई बंद किया था। और समाजवादियों का बात-बात में यह कहना कि मैंने देश बनाने का काम किया, पुल बनाने का काम किया, सोने का काम किया, भी जॉर्ज साहब की देन है।

आज वह दिवंगत हैं। हर मनुष्य की कमजोरियां होती हैं, सीमाएं होती हैं। लेकिन आज उनकी विशेषताएं हमारे स्मरण पटल पर तैर रही हैं। जो भी हो, जॉर्ज साहब को भूलना मुश्किल होगा। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

कॉपी संपादन : सिद्धार्थ/प्रेम बरेलवी)


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