सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती देगा पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद : चंद्रभूषण गुप्त ‘अंकुर’

सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। जब केंद्र सरकार तमाम आंकड़े दे रही है कि विश्वविद्यालयों में आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि विभागवार आरक्षण का रोस्टर बनाया जाय, इस बात का परिचायक है कि सुप्रीम कोर्ट ने दलितों, आदिवासियों और ओबीसी के हितों की उपेक्षा की

बीते 22 जनवरी 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें विश्वविद्यालयों में नियुक्ति के लिए आरक्षण का आधार विश्वविद्यालय के बजाय विभाग को करने का निर्णय दिया गया था। अब इस फैसले को पिछड़ा वर्ग कल्याण संगठन, गोरखपुर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच में चुनौती देगा। इस आशय की जानकारी पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद के अध्यक्ष प्रो. चंद्रभूषण गुप्त ‘अंकुर’ ने फारवर्ड प्रेस से दूरभाष पर हुई विशेष बातचीत में कही।

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गौर तलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से वित्त पोषित उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की भर्ती में आरक्षण कोटा के निर्धारण के लिए संबंधित विभाग को एक इकाई माना जायेगा, न कि विश्वविद्यालय को।  इस प्रकार न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी।

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दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चंद्रभूषण गुप्त ‘अंकुर’ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। जब केंद्र सरकार तमाम आंकड़े दे रही है कि विश्वविद्यालयों में आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि विभागवार आरक्षण का रोस्टर बनाया जाय, इस बात का परिचायक है कि सुप्रीम कोर्ट ने दलितों, आदिवासियों और ओबीसी के हितों की उपेक्षा की।

पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद के अध्यक्ष प्रो. चंद्रभूषण गुप्त ‘अंकुर’

उन्होंने कहा कि यदि विभागवार आरक्षण का निर्धारण किया गया तब विश्वविद्यालयों में दलित, आदिवासी और ओबीसी समुदाय के लोगों की हिस्सेदारी बहुत कम हो जाएगी। एक तरह से उच्च शिक्षा पर सामान्य वर्ग का कब्जा हो जाएगा। उन्होंने कहा कि हमलोगों ने पहले भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को थोपे जाने संबंधी केंद्र सरकार व यूजीसी के फैसले का विरोध किया है।

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प्रो. गुप्त ने कहा कि भारत में संविधान 1950 में लागू हुआ और आज हम लोग 2019 में बात कर रहे हैं। पिछले 68 वर्षों में उच्च शिक्षा में दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के लोगों की कितनी हिस्सेदारी है, क्या यह सुप्रीम कोर्ट को जानकारी नहीं है। यह पूछने पर कि अब वे इस मामले में क्या करेंगे, प्रो. गुप्त ने कहा कि सबसे पहले तो हम आरक्षित वर्ग के लोगों को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले जो कि सामाजिक न्याय के खिलाफ है, के विरोध में गोलबंद करेंगे। इसके बाद हमलोग सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करेंगे ताकि इसकी सुनवाई बड़ी बेंच में हो।

(कॉपी संपादन : सिद्धार्थ)


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  1. JAG MOHAN THAKEN Reply
  2. dr. mukund ravidas Reply

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