दलित बॉक्सिंग चैंपियन को है स्पांसर का इंतजार

अमित कुमार बॉक्सिंग की नामी वुशू चैंपियनशिप में अभी राष्ट्र का नया और युवा सितारा है। उसने हाल में ही गुरदासपुर में नेशनल चैंपियनशिप अपने नाम की। लेकिन उसका आगे का सफर मुश्किल भरा है, क्योंकि उसके सामने आर्थिक अड़चनें खड़ी हो गई हैं

बॉक्सिंग में राष्ट्र का दलित चैंपियन आखिर किसके बूते आगे बढ़े?

पूरा खेल ताकत का है और यह कहानी है हरियाणा के हिसार स्थित मिर्चपुर गांव के अमित कुमार की। वही मिर्चपुर जहां अप्रैल, 2010 में दबंग जाटों ने दलितों के घरों को आग के हवाले कर दिया था। उसी गांव के वाल्मीकि समाज का होनहार नौजवान हैं अमित। उधार किट मांग उन्होंने बॉक्सिंग सीखी और गोल्ड मेडल जीतकर अपनी प्रतिभा साबित कर दी है। वह बॉक्सिंग में नेशनल चैंपियनशिप जीत चुके हैं। उन्हें दक्षिण अफ्रीका खेलने जाना है। लेकिन उनकी राह में आर्थिक अड़चनें हैं। उन्हें प्रायोजकों की तलाश है जो उन्हें जाने में मदद कर सकें।

फिलहाल न तो उन्हें कोई सरकारी सहायता दी जा रही है और न ही कोई स्पांसर सामने आ रहा है।

अमित का जन्म 1 जनवरी 1998 को उस अभागे दलित परिवार में हुआ जो मिर्चपुर में दबंगों के घर जला दिए जाने के बाद पलायन को विवश था। आपको याद होगा जब 2010 में मिर्चपुर में एक विवाद के बाद यहां अप्रैल में एक वृद्ध के घर को आग लगा दी गई थी। इस घटना में वृद्ध और उसकी विकलांग बेटी की मौत हो गई थी। इतना ही नहीं जाटों ने वाल्मीकि समुदाय के यहां अठारह घर जला दिए थे। तब दबंग जाटों ने वाल्मीकि समुदाय के लडकों को अधमरा होने तक पीटा, उनके मुंह में पेशाब की और टट्टी डाली। लड़कियों,  महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और सामूहिक बलात्कार किया गया। इस कांड के दोषियों पर हरियाणा की अबतक की सबसे बड़ी सजा कोर्ट सुना चुकी है।

अपने पिता नरेश कुमार के साथ अमित कुमार

इस घटना के बारे में अमित कुछ भी कहना मुनासिब नहीं समझते। वे कहते हैं कि यह (दलितों पर अत्याचार) रोज-रोज की बातें हैं, मुझे सिर्फ खेलना है, किसी राजनीति में नहीं पड़ना। सुखद आश्चर्य से कम नहीं कि जिन्होंने अमित के माता-पिता को शरण दी, उनका नाम वेदपाल तंवर हैं जो जाति के राजपूत हैं। हिसार स्थित इनके फर्म हाउस में मिर्चपुर के पीड़ित दलित शरण ले रखे हैं। यहीं अमित अपने परिवार के साथ आए थे।

वर्तमान अमित की मां फतेहाबाद के एक अस्पताल में सफाईकर्मी हैं, जहां वह कोई साढे आठ हजार रुपए प्रतिमाह कमाती हैं। इसीसे वह अपनी सास, बेटे और अपनी गुज़र-बसर करती हैं। अमित के पिता नरेश कुमार वेदपाल तंवर के घर और फार्महाउस की देखरेख करके गुजारा करते हैं। लेकिन यह सब इतना नहीं होता जिससे फतेहाबाद में मकान के किराये के खर्च से लेकर दूध, राशन आदि से पार पाया जा सके।

पिछले दिनों यानी 15-16 जनवरी, 2019 को पंजाब के गुरदासपुर में हुई नेशनल वुशू चैंपियनशिप में अमित ने गोल्ड मेडल जीता। फतेहाबाद लौटने पर वाल्मीकि चौक स्थित भावाधस आश्रम में वाल्मीकि समाज की ओर से उनके अभिनंदन में समारोह किया गया। समारोह में क्षेत्र के हर समाज के प्रतिनिधि और क्षेत्रवासियों ने अमित की उपलब्धि को सभी युवाओं के लिए प्रेरणादायक कहा।

अमित इस स्पर्धा में ओलंपिक तक जाने का ख्वाब रखते हैं। लेकिन उनके सामने अड़चनों का बड़ा पहाड़ है। वेदपाल तंवर कहते हैं, “मैं अमित को हर संभव मदद देता हूं, लेकिन उसकी उपलब्धि को देखते हुए उसे बड़े स्तर पर प्रोत्साहन देने की दरकार है। जहां तक सरकारों की मदद का सवाल है तो यह होता तो शायद देश में अब तक बहुत कुछ हो चुका होता। वह नेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड लाया तो उसने सबसे पहले मेडल यहां मेरी पत्नी के गले में डाला। यह हमारे छोटे से प्रोत्साहन का बड़ा प्रतिफल है।”

नेशनल चैंपियनशिप जीतने के बाद वेदपाल तंवर की पत्नी सुशीला तंवर के गले में अपना मेडल डालकर आभार व्यक्त करते अमित

अमित अपनी कहानी कुछ यूं बयां करते हैं, मैंने 2012 में खेलना शुरू किया था। मैं गरीब परिवार से हूं। अपनी ओर से बहुत मेहनत कर रहा हूं। लेकिन आगे बढ़िया खेलने के लिए मेरे सामने कुछ दिक्कतें भी आ रही हैं। वेदपाल जी मेरी अच्छी मदद करते हैं। गुरदासपुर में हुई नेशनल से मेरा चयन हो गया है। मैंने 75 किलोग्राम वर्ग में खेला। जब मैं जीतकर आया तो मेरे गांववासियों ने मुझे आर्थिक मदद दी, जिससे मेरे खानपान (डाइट) का काम चल रहा है। मेरे समाज के अंदर जो मुझे अच्छा लड़का मानते हैं, उन्होंने भी कुछ मदद की। मैं अपनी कोशिश में लगा हूं। मैं वाल्मीकि समुदाय से हूं। आप समझ सकते हैं कि मेरे सामने कितनी मुश्किलें हैं। हमलोग यहां पर किराए पर रहते हैं। मेरे पापा हिसार के फार्म हाउस में मजदूरी कर रहे हैं। मैं फतेहाबाद में कोचिंग करता हूं। मेरा गेम वुशू बॉक्सिंग है। एशियाड के अंदर जम्मू-कश्मीर के भानुप्रताप जी ने प्रतियोगिता में जैसा प्रदर्शन किया, उसने हमें प्रेरित किया है। मैं भी उनकी तरह आगे बढ़ना चाहता हूं। हिसार के नरेंद्र अग्रवाल जी ने भी इस प्रतियोगिता से नाम कमाया है और मेडल लाए हैं। दिल्ली के संतोष जी ने भी वुशू में नाम कमाया है। कनाडा में एक एसोसिएशन बनी है जो इस चैंपियनशिप के सही लोगों को चुनने का काम कर रही है। हमें नेशनल चैंपियनशिप में मिलने वाली प्रशस्ति में ओलंपिक चैंपियन के भी दस्तखत हैं, जो मेरे लिए बहुत प्रेरणादायक हैं। मैं सिर्फ नई ऊंचाई देखता हूं। मैं अपने पिता, अपने समाज और प्रधान जी (वेदपाल तंवर) सबका नाम रोशन करना चाहता हूं। मैं किसी के आगे भीख नहीं मांगना चाहता। सिर्फ कोई स्पांसर मिल जाए तो मैं आगे बढ़ सकता हूं। मेरे कोच सिर्फ यह कहते हैं कि किसी तरह की परेशानी महसूस ना करो। सिर्फ खेल पर अपना ध्यान रखो। मेरे समाज के लोग मेरी मदद करते हैं लेकिन आप जानते हैं कि हमारे समाज के लोग दिहाड़ी मजूरी करके ही गुजारा करते हैं। मैं अपना मेडल लेकर प्रधानजी के घर गया था। उनका आशीर्वाद लिया। उन्होंने हौसला दिया कि कोई दिक्कत नहीं होगी, खूब मेहनत करो। जो भी तुम्हारी जरूरत होगी, उसे हम पूरी करेंगे।

हिसार के तंवर फार्म हाऊस में रह रहा मिर्चपुर का एक दलित परिवार

मिर्चपुर में उनके घर और समाज पर हुए हमले के सवाल पर अमित कहते हैं, मैं काफी समय से कोचिंग में हूं। मैं मौके पर नहीं था। जो नुकसान हुआ हमारे लोगों का, वह तो सभी जानते हैं। हमारा भी घर वगैरह सब जला दिया गया था। मैं उस समय एकेडमी के हॉस्टल में रह रहा था। मेरे दो बड़े भाई-बहन थे, जिनकी डेथ हो गई। अब पापा, मम्मी, दादी और मैं परिवार में हूं। मैं घर चलाने के लिए पार्ट टाइम दिहाड़ी वगैरह करता हूं ताकि ठीक से गुजर बसर हो सके। मम्मी के पैसे से घर का दो हजार किराया, राशन, पानी और दूध का खर्च निकल जाता है लेकिन अपनी किट का सामान खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं। आप तो जानते ही हैं कि मजदूरी में पैसा मिलता ही कितना है। मैं खेलते समय चेस्टगार्ड आदि सामान दोस्तों से मांगता हूं। यह मुझे बहुत खराब लगता है।

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वह आगे कहते हैं, मुझे किसी राजनीति में नहीं पड़ना। मुझे बस अपना काम करना है। मुझे जॉब आदि अभी कुछ नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ आगे बढ़ना है। मुझे आने-जाने, किट, डाइट आदि में हेल्प चाहिए। नरेंद्र जी, भानुप्रताप और संतोष जी की तरह दुनिया में नाम कमाना है। ये सभी मेरे आदर्श स्पोर्ट्स मैन हैं। इनको देखकर ही मैं आगे बढ़ना चाहता हूं। एशियाड में उन्होंने सिल्वर मारा, मेरी कोशिश गोल्ड मारने की होगी। मैं घर में किसी तरह के नाज नखरे नहीं करता। जो मुझे मिलता है, मैं खाता और पहनता हूं। जब ग्लब्स, हेडगार्ड्स, चेस्ट गार्ड आदि सामान मैं दूसरों से लेकर प्रेक्टिस करता हूं तब शर्म आती है। मांग-चांग के गुजारा करना अच्छा नहीं होता, जिससे मैं मुक्त होना चाहता हूं। मम्मी-पापा अपना पेट काटकर मुझे थोड़ा आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। समाज में रहने और निभाने के अपने खर्च होते हैं। मेरे जूस के लिए रोज मम्मी-पापा के पास पैसे नहीं होते। अपने समुदाय के किसी मिस्त्री वगैरह के साथ काम करके मैं डाइट का खर्च निकाल पाता हूं…।

कहना ना होगा कि अमित कुमार जैसे प्रतिभावान खिलाड़ी के सामने आर्थिक हालात कुछ ऐसे हैं कि जो उसके मकसद में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। हरियाणा में खेलों को लेकर समाज और संगठनों में काफी सक्रियता रहती है, लेकिन अमित कुमार के मामले में कहीं ऐसा तो नहीं कि दलित वंचित तबके से होने के कारण उसकी मदद के लिए आने वाले हाथ कुछ कम पड़ गए हैं या हैं ही नहीं?

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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