पाषाण-युग में इंसान

मानव सभ्यता के इतिहास में पाषाण-युग का खास महत्व रहा। इस युग में मनुष्य स्वयं को प्राणी से होमो सेपियंस बना सकापाषाण-युग में इंसान

जन-विकल्प

होमोसेपियंस यानि बुद्धिमान मनुष्य का विकास अचानक नहीं, आहिस्ता-आहिस्ता, क्रमिक ढंग से, कई चरणों में हुआ। मनुष्य के संघर्ष की कहानी जितनी लम्बी है, उतनी ही दिलचस्प भी। इसकी जानकारी हमें बड़प्पन के गुमान से तो दूर रखती ही है, दूसरों के प्रति भाईचारा और प्रेम का भाव भी जगाती है कि हम अंततः थे क्या? किस बात का गुमान हम पालें। दुनिया के अन्य प्राणियों की तरह हम मनुष्य भी एक  प्राणी हैं। यदि हम विचारमान और बुद्धिमान हैं, तब हमारी कुछ जिम्मेदारी बनती है।

एक समय ऐसा था, जब मनुष्य के पास न कोई समाज था,न गांव। नगर और देश तो बहुत दूर की बात थी; बहुत लम्बे समय तक घर भी नहीं था। समूह तो जानवरों के भी होते हैं, पहले भी होते ही थे। इंसानों के भी समूह जरूर थे। इन्हीं समूहों में इन्होंने भोजन इकट्ठे करना, आक्रामक और हिंसक जानवरों से बचाव करना सीखा होगा। कंदराओं और गुफाओं में रहने की शुरुआत तो हो चुकी थी, लेकिन अन्य पशुओं  से अपेक्षित दूरी बनाए रखना अभी इनके लिए संभव नहीं था। हजारों साल में दिन-प्रति-दिन के संघर्ष से इनमें सोचने, गलतियों से सीखने, उसे सुधारने, आपस में सुख -दुःख के अनुभव बांटने और सब से बढ़ कर उन अनुभवों से निरंतर सीखने की कोशिश इन लोगों ने की। इन कोशिशों से ही उनका मानसिक और शारीरिक विकास भी संभव हुआ। जैसा कि पहले ही बतला चुका हूं कि मनुष्य ने पत्थरों से छोटे-छोटे हथियार, नाव, डेंगी या बेड़े बनाना, रस्सियां, हड्डियों से सुई आदि बनाना सीख लिया था। आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है, के सिद्धान्तानुसार ये सब चीजें बनी थीं। इस पूरे ज़माने को मानव-विज्ञानी पत्थर-युग कहते हैं। पत्थर युग का मतलब सब कुछ पत्थर का ही था, जैसा नहीं था। दरअसल, पत्थर इस पूरी सभ्यता का केंद्र था। यह जमाना आज से कोई पांच लाख वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ और कोई ढाई लाख वर्ष तक चला। फिर लम्बे समय तक कोई उल्लेखनीय बात नहीं हुई। इस ज़माने का दूसरा चरण  बहुत बाद में परिलक्षित हुआ। इसका अर्थ है ,मनुष्य की तरक्की बहुत धीरे -धीरे हुई। इस ज़माने का दूसरा चरण बहुत बाद में परिलक्षित हुआ।  इसका अर्थ है, मनुष्य की तरक्की बहुत धीरे-धीरे हुई। पत्थर को संस्कृत में पाषाण कहते हैं और अपनी सुविधा के लिए हम इस ज़माने को पाषाण-युग ही कहना चाहेंगे। यह काल इतना लम्बा है कि इसे कई भागों में बांट कर देखा जाता है। दो भाग तो सीधे-सीधे बनते हैं- प्राचीन या पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल। पुरापाषाण काल को भी पूर्व पुरापाषाण काल, मध्य्पुरापाषाण काल और उत्तर पुरापाषाण काल में विभक्त कर देखा जाता है, ताकि विकास-क्रम का हम सूक्ष्मातिसूक्ष्म अध्ययन कर सकें। नवीन पाषाण काल को भी हम इसी प्रकार विभक्त कर सकते हैं। पाषाण युग के बाद धातु युग आता है, जो मुख्यतया दो भागों कांस्य-युग और लौह-युग में विभक्त है। आज हम इस लौह युग से भी आगे एटम युग में हैं; या अब तो उस एटम युग से भी आगे कंप्यूटर-युग में। इसी तरह मनुष्य जाति का विकास होता गया।

मानव के क्रमिक विकास को दर्शाती एक पेंटिंग (साभार : इन्वर्स डॉट कॉम)

अभी हम पाषाण युग में चलें। उस ज़माने में जब हमारा सबसे भरोसेमंद कोई चीज था, तो वह था पत्थर। पत्थर कई प्रकार के थे, और इन सब से मनुष्य ने गहरा सम्बन्ध स्थापित कर लिया था। सब के भेद-प्रभेद, उनकी विशेषताओं और उपलब्धता के स्थानों से हजारों साल के अभ्यास से वे परिचित हो गए थे। हम हाल के वर्षों तक पत्थरों का उपयोग विश्वसनीय ढंग से करते रहे हैं। हर घर में जांता-चक्की और सिल-बट्टे होते थे जिन पर अनाज और मसाले की पिसाई होती थीं। इनके बिना हमारा काम ही नहीं चलता था। हम ने कभी इन पर सोचने का समय नहीं निकाला कि ये आदिम उपकरण हमें उस पाषाण काल से जोड़ते हैं। त्योहारों ,ख़ास कर दीपावली में, घर की मां इन सील-बट्टों या जांता-चक्की पर दीप या दीये रखना कभी नहीं भूलती थीं। हमारे घर के कबाड़ख़ाने में ये उपकरण अभी भी मिल जाएंगे। इन्हें सहेज कर हम एक इतिहास को सुरक्षित रख सकते हैं।

पुरापाषाण काल कुल मिला कर ढाई लाख वर्षों तक चला। हम कल्पना कर सकते हैं कि इस बीच कितनी तब्दीलियां हुई होंगी। मनुष्य चूंकि फल और मांस दोनों खा सकते थे, अतएव उन्होंने इन दोनों को हासिल करने के संभव उपक्रम किये। आरम्भ में कई तरह के मांस खाना इनकी आदत में रहा होगा। स्वतः मर गए जानवरों के मांस भी खाते रहे होंगे। मछलियों का शिकार करना इनलोगों ने सीख लिया था और कुछ प्रकार के कंद-मूल और फलों से भी ये अपनी क्षुधा मिटाते थे। लेकिन इन सब को प्राप्त करने का कोई समुचित उपाय इन लोगों ने विकसित नहीं किया था। पशुपालन और कृषि  की तरकीब ये अब तक नहीं जानते थे। प्रकृति पर अधिक से अधिक निर्भर थे और उस पर काबू पाना अभी इनके वश का नहीं था।

लैटिन अमेरिका के अरिजोना नामक जगह में एक गुफा में भित्ति चित्र। इसमें एक मनुष्य को एक हाथ में पत्थर से बने नुकीले हथियार और दूसरे हाथ में अटलाट्ल को दिखाया गया है (तस्वीर साभार : वर्ल्ड अटलाट्ल एसोसिएशन)

उत्तर पाषाण काल तक मनुष्य ने कई तरह के औजार बना लिए थे, जिनमें प्रमुख था- हस्तकुठार, पत्थर की छुरी, हड्डी के धारदार ब्लेड, वसूला इत्यादि। हड्डियों से बनी सुई विकसित होते हुए अधिक महीन बन चुकी थी। चमड़ों के विभिन्न टुकड़ों को एक ख़ास ढंग से सिलाई कर ये पहनावे तैयार कर लेते थे। ये पहनावे कड़ाके की ठंड और तीखी धूप से बचाव करते थे। उस वक़्त भी किसी एक चीज के ईजाद होने पर पूरे समुदाय में ख़ुशी व्याप जाती होगी। फिर इस तरह का कोई ईजाद करने वाले की थोड़ी धाक या इज्जत भी बढ़ जाती होगी। अपनी अहर्निश यात्रा में अपनी अलग-अलग खोजों का ये आदान-प्रदान भी करते होंगे। इससे चुपचाप एक सभ्यता के ताने-बाने  स्थापित होते जाते थे। इस काल में मनुष्य जाति ने पत्थर से बने बरछी-भाला फेंकने वाले उपकरण (अटलाट्ल) का निर्माण कर लिया था। इससे भयावह पशुओं पर विजय पाने में उसे आसानी हुई। इसी काल में अफ्रीका के उत्तर-पश्चिम समुद्र तट पर रहने वाले मनुष्यों ने तीर-धनुष का निर्माण कर लिया। यह मनुष्य जाति की अब तक की बड़ी उपलब्धि थी, आज के मिसाइल से कई गुना अधिक महत्वपूर्ण। मिसाइलें हमें मनुष्यों के ही दूसरे समूह पर हमला करने में मदद देती हैं। तीर -धनुष से हमने शिकार करना और खतरनाक जानवरों से अपनी सुरक्षा करना भी सुनिश्चित किया। तीर-धनुष का कई मानव-समूहों ने अपने-अपने तरीके से परिष्कार किया। एक-दूसरे के परिष्कृत तरीकों से अन्य समुदाय के लोग परिचित भी होते होंगे। इस तरह परिष्कार का सिलसिला चलता गया। यह  तीर-धनुष नवपाषाण काल या युग की सबसे बड़ी चीज बन गयी।

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इस ज़माने के दूसरे कई औजार मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं के अनुसार पत्थरों और हड्डियों से औजार बना रहा था। कई ज्यामितिक आकारों- जैसे वृत्त, वर्ग, आयत, त्रिभुज आदि से वह परिचित हो गया था। बहुत संभव है कि इन्हें अलग-अलग बतलाने के लिए इन लोगों ने इनके लिए अलग-अलग शब्द भी गढ़ लिए हों। मनुष्य के पास भिन्न स्वर और व्यंजन अक्षर-ध्वनियों से अलग-अलग शब्द गढ़ने की क्षमता इस जीवन-संघर्ष के बीच ही विकसित हुई। इससे उनका शब्द भण्डार भी धीरे-धीरे विकसित हो रहा था। जैसे-जैसे वह नए-नए औजारों का विकास कर रहे थे उनकी प्रकृति और प्रवृति बदलती जा रही थीं। औजार दो तरह के थे। एक जिनसे वे शिकार कर सकते थे और फिर दूसरे जिनसे हिंसक पशुओं से वे अपनी सुरक्षा करते थे। फिर वैसे औजार थे जिनसे मछली पकड़ने, फल तोड़ने, मांस या फलों को काटने, चमड़ा निकलने आदि में प्रयोग करते थे। चकमक पत्थरों से आग पैदा करना उन्हें कुंडों में जीवित रखना उन्होंने सीख लिया था। मांस को पका कर खाना अब सामान्य बात थीं। फलों को इकठ्ठा करना और थोड़ी बहुत खेती करना भी उन्होंने जान लिया था। नदी किनारे की मिटटी मुलायम  और उपजाऊ हुआ करती थी। इन्हें खैर या इसी किस्म की कुछ लकड़ी के हल जैसे उपकरणों से खोदना-खुरचना इनलोगों ने शुरू कर दिया था। इसमें उन बीजों को लगाया जिन्हे वह उगते देखते आये थे। निश्चित ही इन सब कामों में अगुआई इक्के-दुक्के लोग ही करते होंगे। ये लोग अन्य की अपेक्षा अधिक चिंतनशील होंगे और कुछ न कुछ हमेशा सोचते रहते होंगे। आज के वैज्ञानिकों की तरह।

सबसे पहले इंसान ने गेहूं और जौ की खेती आरम्भ की। यह दोनों एक विशिष्ट किस्म की घास है, जिनमें बीज होते हैं। लम्बे समय की कोशिशों से और उनके भिन्न प्रजातियों के बीच लगातार के अंतर्निषेचन से विकसित और अपेक्षाकृत बड़ी बालियों वाली गेहूं की संकर प्रजाति का उगना संभव हुआ। इन संकर प्रजातियों में कुछ अच्छे थे, कुछ कम अच्छे, कुछ निकृष्ट जैसे। मनुष्य ने इन सब में फर्क करना सीखा। अच्छे का चयन करना, उसे बनाये रखना या उसका विकास करना मनुष्य की आदिम प्रवृति रही है। यह ऐसी प्रवृति नहीं है, जिसकी तिलांजलि दे दी जाय। दुर्भाग्य से आज यह प्रवृति घटती जा रही है।

गेहूँ की खेती के कम से कम दो हजार साल बाद धान  (चावल ) की खेती शुरू हुई। ऐसा क्यों हुआ? दरअसल गेहूँ और चावल की खेती में बड़ा फर्क था। गेहूँ पैदा करना आसान था ,चावल पैदा करना मुश्किल। गेहूँ को कम पानी की जरुरत होती है, धान को अधिक पानी की। गेहूँ की जड़ें भी धान के मुकाबले छोटी होती हैं। इसलिए धान की खेती का विस्तार धातु  युग-उसमें भी लौह युग आने के बाद ही हुआ। हालांकि छोटे रूप में उनकी खेती शुरू हो चुकी थी। अनुमान होता है अधिकतर बावग अर्थात ऐसी धान खेती होती थी, जिसमें बिचड़ों को बिना गुड़ाई किये खेत में बिखेर दिया जाता था। बरसात में खुद के जल प्रबंधन से यह फसल हो जाती  थी। इसमें उपज की दर काफी कम होती थीं, लेकिन हाल के वर्षों तक कुछ पिछड़े इलाकों में ऐसी खेती का प्रचलन था।

कृषि के विस्तार ने मनुष्यों को एक जगह टिकना सिखलाया। जो खेती करते थे, उनकी फलियां आने का उन्हें इन्तजार करना पड़ता था फिर उन अनाजों को खाने लायक बनाने के लिए उनका प्रसंस्करण होता था। इन सब में समय लगता था। कृषि बहुत ही अधिक धैर्य की मांग करता है और यह अपने से जुड़े किसानों को बहुत कुछ आध्यात्मिक भी बना देता है। पशुपालन हालांकि मनुष्य पहले भी करते थे और कुत्ते तो पुरापाषाण काल से ही उनके जीवन से किसी न किसी प्रकार जुड़ गए थे, क्योंकि इनका इस्तेमाल शिकार करने में भी होता था। लेकिन कृषि  के साथ पशुपालन आवश्यक रूप से जुड़ गया। पशुओं का इस्तेमाल कृषि कार्य में भी होने लगा, हालांकि अभी मांसाहार के लिए ही पशुपालन अधिक होता होगा, ऐसा अनुमान है। दूध पाने के उद्देश्य से पशुपालन कुछ बाद में हुआ होगा। कृषि और पशुपालन का समुचित विकास भले ही धातु युग में हुआ, लेकिन इसका आरम्भ काफी पहले हो चुका था। कृषि के साथ दस्तकारी का विकास भी हुआ। लकड़ी, चमड़े और हड्डियों, खास कर हाथी दांत से बनी विविध सामग्रियां बनने लगी थी। इन तमाम श्रमिकों को लेकर मानव समूह बनने लगे थे। ये बस्तियां थीं। हर बस्ती अपने आप में देश होता था।

नवपाषाण युग आज से दस या बारह हजार साल पहले आरम्भ हुआ। कृषि और पशुपालन की एक परंपरा विकसित हो चुकी थी। जल प्रबंधन, अनाज भण्डारण, अनाज प्रसंस्करण आदि जरूरतों के साथ बर्तन-बासन बनने लगे। आरम्भ में सभी बर्तन मिटटी से बने होते थे। बड़े-बड़े मृदभांडों में अनाज रखे जाते थे। अनाज को ख़राब होने से बचाने के लिए पॉलिश किये हुए मृदभांड भी बनाये जाने लगे थे। जल संग्रह के लिए तो घड़ों का इस्तेमाल होता ही था। अग्निकुंड और घरेलु चूल्हे अपने ही किस्म की खोज थीं। भिन्न मौसमों में आग-पानी को काबू में रखना मनुष्य ने सीख लिया था। मिटटी के बर्तनों में चूल्हे या सामूहिक कुंड में भोजन पकाना अब आम बात हो गयी थीं। मनुष्य का जीवन तो हमेशा संघर्षपूर्ण रहता है, आज के ज़माने में भी है, लेकिन उस ज़माने की हम कल्पना करें, तो एक अजीब अनुभव होता है कि हम क्या थे? कैसे रहते थे?

(कॉपी संपादन : नवल)


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