दिल्ली में हिंदी-अंग्रेजी के चंद पत्रकार बन रहे नेशनल मीडिया

राष्ट्रीय मीडिया की अवधारणा वह नहीं है जो दिल्ली में बैठे हिंदी-अंग्रेजी के कुछ पत्रकार निर्धारित करते हैं। भाषाई पत्रकारिता के बगैर राष्ट्रीय मीडिया की अवधारणा पूरी नहीं होती

मीडिया की कहानी, मीडियाकर्मी की जुबानी

(मीडिया की कहानी, मीडियाकर्मी की जुबानी’ स्तंभ के तहत हम विभिन्न मीडिया संस्थानों में काम कर रहे  पत्रकारों के अनुभव उन्हीं की जुबानी प्रकाशित कर रहे हैं। आज पढ़ें मराठी के वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले का साक्षात्कार। निखिल ने इमरजेंसी के दौरान पत्रकारिता शुरू की। महज बीस वर्ष की उम्र में ‘दिनांक’ अखबार के संपादक बनने के बाद उन्होंने  पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1990 में इनके द्वारा शुरू किया गया ‘महानगर’ मराठी अखबार 16 वर्षों तक महाराष्ट्र में कई कारणों से चर्चा के केंद्र में रहा। कई दफा उनके ऊपर हमले भी हुए। 20 अप्रैल 2019 को निखिल वागले को कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान-2018 से सम्मानित किया गया। प्रस्तुत है ईमेल के जरिए उनसे किया गया यह साक्षात्कार )

नवल किशोर कुमार (न.कि.कु.) : बीते 20 अप्रैल, 2019 को जब दिल्ली में आपको कुलदीप नैयर सम्मान-2018 दिया गया, तब आपने अपने संबोधन में क्षेत्रीय भाषाओं की पत्रकारिता की उपेक्षा का आरोप हिंदी और अंग्रेजी मीडिया पर लगाया था। क्या आपको लगता है कि ऐसा इसलिए भी है कि क्षेत्रीय भाषा की पत्रकारिता में उतने प्रयोग नहीं हुए/किए गए जितने कि अंग्रेजी और हिंदी में?

निखिल वागले (नि.वा.) : देखिए, उपेक्षा तो हुई है। दिल्ली मे बैठे कुछ चंद हिंदी-अंग्रेजी पत्रकार जब राष्ट्रीय मीडिया बन जाएंगे, तो क्या होगा? हम भाषाई पत्रकार संघर्ष करते हैं, लेकिन हम ‘रिजनल’ ही रहते हैं। महाराष्ट्र में निखिल वागले से लेकर नार्थ ईस्ट में पॅट्रिशिया मुकीम तक सारे भाषाई पत्रकार अलग-अलग प्रयोग कर रहे हैं। कई सालों से खतरा मोल लेकर हम अन्वेषण करते हैं और सच सामने लाते हैं। कभी आपको इसका पता चलता है? 40 सालों के बाद कभी पुरस्कार मिलता है। लेकिन, मेरे हिसाब से इससे ज्यादा जरुरी है भाषाई पत्रकारिता के काम का सम्मान होना।

न.कि.कु. : आप पत्रकार, संपादक, प्रकाशक, एंकर रहे और अब स्वतंत्र पत्रकार हैं। पत्रकारिता के लिहाज से इन सभी भूमिकाओं को आज के परिप्रेक्ष्य में आप किस रूप में देखते हैं?

नि.वा. : मेरे खयाल से यह सभी एक पत्रकार की अलग-अलग भूमिकाएं हैं। चालीस साल मैने सच खोजने का काम किया। आज सत्य की खोज सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री लगातार झूठ बोले जा रहे हैं। पिछले पांच सालों से फासिज्म का खतरा  बढा है। पत्रकार इस समय लोकतंत्र का प्रहरी बन सकता है। यही कर्तव्य मैं बजा रहा हूं।

मराठी पत्रकार निखिल वागले

न.कि.कु. : इमरजेंसी के दिनों में आपने पत्रकारिता शुरू की। उन दिनों पत्रकारिता के विषय में दलित-बहुजनों की उपस्थिति किस रूप में थी और क्या उनके विषयों को जगह मिल पाती थी? खासकर मराठी पत्रकारिता में तब दलित-बहुजन कहां थे और आज उन्हें कहां पाते हैं?

नि.वा. : उस वक्त पत्रकारिता में दलित-बहुजन बहुत कम थे। लगातार प्रयास करने पर मंडल के बाद यह संख्या बढ़ने लगी। मुझे गर्व है कि मेरे हर पत्रिका या चैनल में बहुजन-दलितों का योगदान बडा है। इसलिए मेरी पत्रकारिता आम समाज की पत्रकारिता बन सकी। पिछले कुछ सालों से मराठी पत्रकारिता में बहुजनों मसलन दलितों-आदिवासी और पिछड़े वर्गों की आवाज सुनाई दे रही है।


न.कि.कु. : बाजार का दबाव आप किस रूप में महसूस करते हैं?

नि.वा. : 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद बाजार का दबाव बढ गया है। हर कदम पर मार्केटिंग वाले संपादन विभाग का अतिक्रमण करते हैं। मीडिया मालिक के लिए पत्रकारिता का महत्व कम हुआ है, और रेवेन्यू ज्यादा अहम बन गया है। ऐसे हालात में पत्रकार दबाव में आ जाते हैं। यह पत्रकारिता के लिए जिंदगी और मौत की लड़ाई है।

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न.कि.कु. : सोशल मीडिया और न्यूज पोर्टल आदि को आज विकल्प के रूप में देखा जा रहा है? क्या आपको लगता है कि बिना जवाबदेही और बुनियादी संरचना के यह संभव है?

नि.वा. : हर विकल्प में जबाबदेही तो होनी ही चाहिए। लेकिन सोशल मीडिया से मेरे जैसे आजादी पसंद पत्रकार को नया प्लेटफाॅर्म मिला है। यह संक्रमण का काल है। आगे सोशल मीडिया नयी करवट लेगा।

न.कि.कु. : आज के युवा पत्रकारिता को पैशन से अधिक पेशा मानते हैं। आप इसे किस रूप में देखते हैं?

नि.वा. : जमाना बदल गया है। हम आंदोलन से पत्रकारिता में आये। हमारा मकसद समाज परिवर्तन था। आजकल के युवा पत्रकार प्रोफेशनल हैं। यह बात सच है, लेकिन पैशन उनमें भी है। कई तो हमारी जेनरेशन से बेहतर काम कर रहे हैं। मैं युवा पत्रकारों को लेकर आशावादी हूं। वे लड़ना सीखेंगे, आखिरी आदमी तक जाएंगे तो जरुर अच्छा काम करेंगे।

(कॉपी संपादन : सिद्धार्थ)


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