इक्कीसवीं सदी में ऐसे गुजर-बसर कर रहे हैं नेतरहाट के असुर

पर्यटन स्थल के साथ ही नेतरहाट की पहचान उच्च गुणवत्ता वाले नेतरहाट स्कूल की वजह से भी है। इसकी चर्चा प्रसिद्ध साहित्यकार रणेंद्र ने अपने उपन्यास ‘ग्लोबल गांव के देवता’ में की है। इसी नेतरहाट के एक आदिम जनजाति समुदाय के लोगों के गांव ताहेर की दास्तान बता रहे हैं विशद कुमार

झारखंड के लातेहार जिले का महुआडांड़ प्रखंड का पंचायत है नेतरहाट, जो प्रखंड मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर है। नेतरहाट राज्य में पर्यटन के लिए प्रसिद्ध है। यहां पूरे साल हजारों की संख्या में पर्यटक घूमने आते हैं। बावजूद नेतरहाट पंचायत के अंतर्गत आने वाले कई गांवों के लोग, जिनमें अधिकांश आदिम जनजाति असुर समुदाय के हैं, आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। इसी पंचायत का एक गांव है ताहेर, नेतरहाट से ताहेर गांव तीन किलोमीटर दूर है, बावजूद इसे नेतरहाट का टापू कहा जाता है। 

यह ताहेर गांव पूरी तरह मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। इस गांव में एक भी शौचालय नहीं बनाया गया है, लेकिन इसे ओडीएफ ( खुले में शौच से मुक्त) घोषित कर दिया गया है। हालांकि पुरूषों या सामान्य महिलाओं को कोई विशेष परेशानी तो नहीं होती है, क्योंकि वे शौच के लिए खेतों या जंगल में चले जाते हैं। लेकिन गर्भवती महिलाओं व बीमार लोगों के लिए दूर जाना काफी कष्टकारी हो जाता है। सबसे दुखद पहलू यह है कि गांव या आसपास के किसी गांव में स्वास्थ्य केन्द्र तक नहीं है, जिसकी वजह से खासकर गर्भवती महिलाओं को प्रसव कराने के लिए या तो अप्रशिक्षित स्थानीय महिला का सहारा लेना पड़ता है या फिर दस-पंद्रह किलोमीटर दूर शहर जाना पड़ता है। ऐसे में कई महिलाएं सुरक्षित प्रसव के लिहाज मायके या किसी रिश्तेदार के पास चली जाती हैं, जहां अस्पताल और शौच की सुविधा रहती है। 

नेतरहाट पंचायत से मात्र तीन किलोमीटर दूर लगभग 200 की जनसंख्या वाले ताहेर गांव में कुल संख्या 30 है। यहां आदिम जनजातियों में 17 घर बिरजिया असुर और 13 घर नागेसिया जनजातियों का है। ताहेर गांव दो टोली में बसा है। वैसे तो नेतरहाट से गांव पहुंचने के लिए तीन किलोमीटर की सड़क है। लेकिन वह काफी जर्जर है। गांव में पीने का शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं है। 

गांव के बाहर चुआं से पानी भरतीं नेतरहाट के ताहेर गांव की महिलाएं

रोजगार के अभाव में गांव के लगभग सभी नौजवान दूसरे राज्यों में पलायन को मजबूर हैं। बता दें कि ताहेर गांव में एक भी चापाकल नहीं है। जिसके कारण ग्रामीण गांव से सटे कुछ दूर जंगल में स्थित चुआं या चुआंड़ी का पानी पीने को विवश हैं। वहीं कुछ लोग पहाड़ी नाला की रेत को हटाकर गढ्ढा करके चुआं बनाकर पानी पीते हैं। हालांकि गांव में एक कुआं था। गांव में पेयजल की समस्या दूर करने के लिए उस कुआं में 2019 14वीं वित्तीय योजना के तहत सौर ऊर्जा से चलने वाली पानी की टंकी लगायी गयी थी। मगर 2020 से कुआं धंसने के कारण पानी की टंकी बेकार पड़ी हुई है। बता दें कि गांव के आदिवासी परिवार चुआं और नाले का इस्तेमाल पानी पीने के साथ-साथ मवेशी को नहलाने एवं कपड़ा धोने के रूप में भी करते हैं।

ग्रामीण वीरेन्द्र बिरजिया बताते हैं कि गांव में पीने का पानी की भारी समस्या है। हमलोग चुआं और नाले से पानी पीते हैं। मवेशी भी इसी से पानी पीते हैं। गांव में पुराना कुआं था, वह एक साल पहले धंस गया। जनप्रतिनिधि भी ध्यान नहीं देते हैं। गांव तक पहुंचने वाली सड़क भी काफी जर्जर है। जनप्रतिनिधियों के सामने कई बार गुहार लगा चुके हैं। लेकिन सुनवाई नहीं हुई। चुनावों के समय तो बड़े-बडे दावे व वादे किए जाते हैं। किंतु चुनाव जीतने बाद जनप्रतिनिधि फोन तक नहीं उठाते हैं।

गांव की सुचिता नगेसिया कहती हैं कि ताहेर गांव में एक भी शौचालय नहीं बनाया गया है। लेकिन इसे ओडीएफ घोषित कर दिया गया है।वैसे तो महिलाओं को सशक्त करने के लिए गांव में दो महिला समूह ‘सरई फूल’ व ‘सहेली समूह’ बनाया गया है, जिसमें एक में 10 एवं दूसरे मे 12 महिला सदस्य हैं, लेकिन यह सिर्फ नाम का है। आज तक एक भी बैठक नहीं हुई।

वहीं वार्ड सदस्य शांति देवी कहती हैं कि गांव में कोई रोजगार का साधन नहीं है, मनरेगा के तहत भी कोई योजना नहीं चलती है। कौन रोजगार सेवक है? इसकी भी जानकारी ग्रामीणों को नही है। गांव तक कोई अधिकारी नहीं आता है। क्षेत्र की भौगोलिक संरचना ऐसी है कि खेती भी नहीं के बराबर होती है। क्योंकि सिंचाई का कोई साधन नही है। लगभग 25 से अधिक युवक इस वर्ष गांव छोड़कर केरल, दिल्ली या अन्य राज्यों में कमाने चले गये हैं। दूसरी तरफ सरकारी राशन लेने के लिए ग्रामीणों को तीन किलोमीटर पैदल चलकर नेतरहाट जाना पड़ता है। 

जबकि इन तमाम समस्याओं पर स्थानीय प्रशासन खामोश है, वहीं नेतरहाट की मुखिया मानती देवी भी पूछे जाने पर कुछ भी कहने से इनकार करती हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)

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