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अभी हम आदिवासियों का पेट नहीं भरा है : वासवी किड़ो

‘विस्थापन झारखंड को खाए जा रहा है। झारखंड अलग राज्य अगर बना है तो विस्थापन का सवाल तो हल करना ही पड़ेगा। विकास का ऐसा मॉडल लाना पड़ेगा कि कोई आदिवासी गांव ना उजड़े। और जबतक यह मॉडल नहीं आएगा, हमलोगों को आंदोलन करना पड़ेगा।’ पढ़ें, वासवी किड़ो के साक्षात्कार का अंतिम भाग

[झारखंड महिला आयोग की पूर्व सदस्या वासवी किड़ो झारखंड की सुपरिचित आदिवासी साहित्यकार व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। इसके अलावा वह पत्रकार के रूप में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ व ‘जनसत्ता’ आदि समाचार पत्रों से संबद्ध रही हैं। इन्होंने झारखंड में अनेक आंदोलनों में हिस्सा लिया और कइयों का नेतृत्व भी किया है। ज्योति पासवान ने उनसे यह विस्तृत बातचीत की है। पढ़ें, इस बातचीत का दूसरा और अंतिम भाग]

पहले भाग में आपने पढ़ा : ‘झारखंड के हिस्से में अब भी क्यों है कोख में अमीरी और गोद में गरीबी?’

शिबू सोरेन व अन्य नेताओं के साथ आपके संबंध कैसे रहे?

शिबू सोरेन और बाकी नेताओं के साथ बहुत अच्छे संबंध थे। अखबार में काम करने के दौरान मैं उनके प्रेस कांफ्रेंस, रैलियों आदि में रिपोर्टिंग के लिए जाया किया करती थी। शिबू सोरेन ने बहुत पहले ही एक बार मुझे अपनी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा से जुड़ने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन मैं उस समय अपना ध्यान पढ़ाई में लगाना चाहती थी। परिवार में भी मेरी स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए मैंने यह तय कर लिया था कि मुझे कुछ बनना था। तो उस समय मैंने राजनीति में आने से मना कर दिया था। दिशोम गुरू से मेरी पहली मुलाकात रांची में हुई थी। तब मेरे साथ एक संथाली महिला थी। वह 1993 में जब गुरू जी सांसद थे और दिल्ली रहते थे, तब वह लड़की उनके घर में खाना बनाने का काम करती थी। वर्ष 2007 में उसके साथ हजारीबाग में गैंगरेप हो गया था। उसने मुकदमा तो दर्ज कराया था, लेकिन कार्रवाई नहीं की जा रही थी। मेरे पास वह 2009 में आयी तब शिबू सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री थे। वह लड़की उनसे मिलना चाहती थी। मैंने उसे गुरुजी से मिलवाया। वहां हेमंत सोरेन भी मौजूद थे। उन्होंने उस लड़की की मदद की। तब से वे लोग मुझे जानते हैं। हेमंत सोरेन के साथ भी मेरे संबंध अच्छे रहे हैं। वर्ष 2016 में हेमंत सोरेन ने एक ‘समन्वय समिति’ का गठन किया था। इस समिति में वामदल और सामाजिक आंदोलनकारियों को सदस्य के रुप में रखा था, जिसमें से एक मैं भी थी। इस समिति की दो-तीन बैठकें हुई थीं। चूंकि विस्थापन एक गंभीर मुद्दा है, इसलिए इन बैठकों में हमने ‘विस्थापित आयोग’ की स्थापना की मांग उठायी थी। मैंने कहा था– देखें, झारखंड में आठ कारणों से विस्थापन हुए हैं। इनमें पहला कारण खनन (कोयला, यूरेनियम, चूना-पत्थर, लौह-अयस्क सहित 49 प्रकार खनिज) है। आदिवासियों की जमीन चली जाती हैं, जिससे उनका विस्थापन होता है। दूसरा यह कि कल-कारखानों की स्थापना , लघु-वृहत सिंचाई परियोजनाओं, पार्क एवं अभयारण्य आदि बनाने, प्राइवेट कम्पनियों की स्थापना, बड़ी-बड़ी सरकारी कंपनियों की स्थापना तथा रेलवे की परियोजनाओं आदि कारणों से झारखंड में विस्थापन हुए हैं। जैसे यहां स्वर्णरेखा परियोजना, दामोदर घाटी परियोजना, अजय बराज, हाइड्रो पॉवर, थर्मल पॉवर इन परियोजनाओं के कारण विस्थापन हुआ है। और सभी विस्थापनों के अलग-अलग स्वरुप हैं। सरकारी और गैर-सरकारी कम्पनियों द्वारा विस्थापन के पुनर्निवेशन फंड भी अलग-अलग तरीके से तैयार किये जाते हैं। मेरा मानना है कि उनमें एकरुपता लानी चाहिए, जिससे परिवार के सभी सदस्यों को नौकरियों एवं मुआवजा का लाभ मिल सके। विधानसभा के कुछ सदस्यों द्वारा विस्थापन आयोग की मांग के मुद्दे को समर्थन भी मिला है। वर्तमान में इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। झारखंड के लिए विस्थापन एक बड़ा एजेंडा है। हमलोग विस्थापन मुक्त झारखंड चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारे विकास के मुद्दों पर बहस हो। सरकार ऐसा विकास लेकर आये कि किसी व्यक्ति का विस्थापन ना हो। बिना विस्थापन के विकास संभव है। केंद्र सरकार ने जिस नीति आयोग का गठन किया है, उसमें एक से बढ़कर एक विद्वान, स्कॉलर बैठे हैं। उनकी लाइब्रेरी में बड़ी-बड़ी पोथियां हैं। ऑक्सफोर्ड से लेकर कैंब्रिज तक की डिग्रीधारी नीति आयोग में बैठे हैं। वे तय करें कि बिना विस्थापन के विकास कैसे किया जाय। आप देखें कि विस्थापन होते ही रहे हैं। औपनिवेशिक अवधि और उसके पहले की अवधि में , आजादी के पहले और आजादी के बाद भी। जब अंग्रेजों का राज था तब रेलवे की पटरी बिछाने के लिए लाखों साल के पेड़ काट दिए गए। आज भी पेड़ों पर निशान लगा दिए गए हैं। उन्हें भी काट दिया जाएगा। आज जो फोरलेन और सिक्सलेन सड़कें बनाई जा रही हैं, उनके कारण लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं, जिससे पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ रहा है और जमीन का स्वरुप बदल रहा है। इसका असर आबादी के बसाहट पर भी पड़ता है और संतुलन बिगड़ता है। आदिवासियों की जगह बाहर से नये लोग आकर बस रहे हैं। विस्थापन झारखंड को खाए जा रहा है। झारखंड अलग राज्य अगर बना है तो विस्थापन का सवाल तो हल करना ही पड़ेगा। विकास का ऐसा मॉडल लाना पड़ेगा कि कोई आदिवासी गांव ना उजड़े। और जबतक यह मॉडल नहीं आएगा, हमलोगों को आंदोलन करना पड़ेगा।

पूरा आर्टिकल यहां पढें : अभी हम आदिवासियों का पेट नहीं भरा है : वासवी किड़ो

लेखक के बारे में

ज्योति पासवान

दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. ज्योति पासवान काज़ी नज़रुल विश्वविद्यालय, आसनसोल, पश्चिम बंगाल में पीएचडी शोधार्थी हैं

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