झारखंड : दो साल पहले दिया जमीन का कागज, वनकर्मियों ने आदिम जनजाति की महिलाओं पर ढाया जुल्म

आदिम जनजाति कोरबा समुदाय की महिलाओं पर बीते 27 जुलाई को झारखंड के वनकर्मियों और पुलिसकर्मियों ने कहर ढाया। इस घटना के बारे में बता रहे हैं विशद कुमार

मामला आदिवासी बहुल राज्य झारखंड के गढ़वा जिला का है। जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर दक्षिण में रंका थाना के अंतर्गत एक गांव है लूकुम्बार। इस गांव में रहने वाले कोरवा नामक आदिम जनजाति के लोगों ने दो साल पहले ही जमीन संबंधी दस्तावेज स्थानीय प्रशासन को सौंप दिया था। दस्तावेज उस जमीन के थे, जिनपर वे पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं। लेकिन गत 27 जुलाई, 2022 को सुबह साढ़े नौ बजे के करीब वन विभाग के कर्मियों और स्थानीय रंका थाना के पुलिसकर्मियों ने उनके ऊपर जुल्म ढाया। आदिवासियों ने इस संबंध में रंका थाना में अपनी शिकायत दर्ज करायी है। लेकिन इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

स्थानीय निवासियें के मुताबिक, 27 जुलाई को जब आदिवासी अपने खेत में काम कर रहे थे, तब वनकर्मी और पुलिसकर्मी आ गए और हल व अन्य उपकरण आदि उठाकर ले जाने लगे। घटना के वक्त अधिकांश पुरुष अपने जानवरों को चराने और मजदूरी करने गए हुए थे। खेतों में काम कर रहीं महिलाओं ने वनकर्मियों व पुलिसकर्मियों का विरोध किया। तब उनके उपर इन कर्मियों ने हमला बोल दिया। इस क्रम में करीब 6 माह की गर्भवती सुनीता देवी (पति सुकन कोरवा), विमला देवी (पति रामचंद्र कोरवा) को तब तक पीटते रहे जब तक वे जमीन पर गिर नहीं गईं। पुलिसकर्मियों व वनकर्मियों की ज्यादती के कारण वे घायल हो गईं। लेकिन घायल महिलाओं को इलाज के लिए जंगली रास्ता होने और वाहनों की सुविधा न होने के कारण नहीं ले जाया जा सका।

खेत में घायल पड़ी महिलाओं को संभालतीं गांव की अन्य महिलाएं

ग्रामीण बताते हैं कि वनकर्मी और पुलिसकर्मी तीन गाड़ियों में आये थे, जिसमें से एक कमांडर जीप था, जिसका नंबर 0922 था। जबकि दो सफ़ेद रंग का बोलेरो था। 

ग्रामीणों के मुताबिक लुकुम्बार गांव के सभी लोगों ने वन अधिकार कानून, 2006 के प्रावधानों के तहत अपनी-अपनी जमीनों के स्वामित्व संबंधी दस्तावेज सामुदायिक एवं व्यक्तिगत पट्टा के लिए अनुमंडल स्तरीय समिति को 20 जुलाई, 2020 को ही दस्तावेज सुपुर्द किये हैं। जबकि अनुमंडलाधिकारी ने पत्रांक 762 दिनांक के जरिए 16 नवंबर, 2021 के हवाले बताया है कि कोविड महामारी के कारण किसी तरह के सामुदायिक दावा पत्रों पर कार्यवाही नहीं की जा सकी है।

बताते चलें कि वन अधिकार कानून, 2006, के अनुच्छेद 3 की उपधारा 4 (5) में स्पष्ट उल्लेख किया गया है– “जैसा कि अन्यथा उपबन्धित है, उसके सिवाय, किसी भी वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति या अन्य परंपरागत वन निवासियों का कोई सदस्य उसके अधिभोगाधीन वन भूमि से तब तक बेदखल नहीं किया जाएगा या हटाया नहीं जाएगा, जब तक कि मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती है।” 

अब इस आधार पर देखें तो वन विभाग के अधिकारियों ने इस क़ानूनी धारा का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन किया है।

इस घटना के विरूद्ध आदिम जनजाति के सदस्यों ने रंका थाना में वनों के क्षेत्र पदाधिकारी (गढ़वा दक्षिणी वन प्रमंडल, रंका क्षेत्र) सहित 25 अन्य वनकर्मियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने के बाबत आवेदन दिया है और मुकदमा चलाने की मांग की है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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