छत्तीसगढ़ राज्य के सूरजपुर जिले के आदिवासी, पिछड़े और दलित अपनी सांस्कृतिक मूल्यों-मान्यताओं को लेकर अन्य आदिवासी क्षेत्रों की तरह ही काफी मुखर हो रहे हैं। सूरजपुर के आदिवासियों ने चेतावनी दी है कि दुर्गा पूजा और विजयादशमी के दौरान उनके आराध्य महिषासुर और रावेन (रावण) का दहन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सूरजपुर आदिवासी बहुल जिला है, जहां लगभग 70 प्रतिशत आदिवासी आबादी निवास करती है, पिछड़ों-दलितों की आबादी मिलाकर यह 98 प्रतिशत होता है। यानी यहां मात्र 2 प्रतिशत अगड़ी आबादी है। 15 अगस्त, 2011 को सरगुजा से काटकर सूरजपुर अलग जिला बनाया गया था।
सूरजपुर के ‘छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज’ के युवाओं ने शासन-प्रशासन को ज्ञापन सौंपा है कि दुर्गा पूजा पर महिषासुर वध और रावण दहन कर हमारे आदर्शों का उपहास हिंदू समुदाय द्वारा न उड़ाया जाए। ये युवा आदिवासियों के बीच जागरुकता पैदा कर रहे हैं कि हमारे आदर्श– महिषासुर और रावेन का हिंदू उत्सवों के नाम पर जो अपमान किया जाता है, वह असल में हमारी सांस्कृतिक मूल्यों-मान्यताओं और पुरखों का अपमान है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाए।

गौरतलब है कि पिछले साल भी देशभर के दर्जनों संगठनों ने मध्यप्रेदश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में इस प्रकार के ज्ञापन सौंपकर प्रशासन को चेतावनी दी थी, इसी सिलसिले में कुछ जगहों पर दुर्गा पूजा के दौरान महिषासुर वध और रावण दहन किए जाने पर एफआईआर भी दर्ज करायी गयी थी।
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हालांकि इस मामले में इन संगठनों के लोगों को कुछ प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा धमकी दी गयी और सोशल मीडिया पर लिखने या किसी का लिखा शेयर करने पर मामले भी दर्ज हुए थे। कुछ जेल की सजा काट चुके हैं तो कुछ अभी भी जेलों की सीखचों के पीछे हैं। मगर इससे इनका हौसला और बढ़ा है, बल्कि महिषासुर के समर्थन में यह आंदोलन और ज्यादा विस्तार लेता जा रहा है। सभी आदिवासी इलाकों में सांस्कृतिक मूल्यों-मान्यताओं के प्रति जबर्दस्त जुनून देखने को मिल रहा है।
सूरजपुर के ‘छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज’ संगठन के युवाओं ने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल, सूरजपुर के जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, अनुभागीय अधिकारी, राजस्व दंडाधिकारी को ज्ञापन दिया है। ज्ञापन में लिखा है कि “आदिवासी मूलनिवासियों के पूर्वज असुर राजा महिषासुर की प्रतिमा को दुर्गा प्रतिमा के साथ रखकर हिंसक दिखाकर अपमानित किया जाता है, जो सिर्फ असुर राजा महिषासुर का ही अपमान नहीं, बल्कि सर्व आदिवासी-मूलनिवासी समाज का भी अपमान है। गोंडवाना सम्राट महाराज रावेन (रावण) पेन की प्रतिमा बनाकर बुराई का प्रतीक मानकर जलाया जाता है, जबकि आदिवासी समुदाय प्राचीनकाल से ही उन्हें अपना आराध्य मानता है, इसलिए रावण दहन पर तत्काल रोक लगायी जाए।”

ज्ञापन में बताया गया है कि “भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 केे अनुसार धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के ही आधार पर भेदभाव वर्जित है। इसके अनुसार असुर राजा महिषासुर की प्रतिमा को दुर्गा के साथ हिंसक दिखाना और महाराज रावेन की प्रतिमा को बुराई का प्रतीक मानकर जलाना संविधान का सरेआम उल्लंघन है। अत: कोई व्यक्ति, संगठन या समिति इस ज्ञापन के बावजूद अगर महिषासुर की प्रतिमा को दुर्गा के साथ हिंसक रूप में दर्शाता है और रावेन की प्रतिमा को जलाता है तो उसके विरूद्ध कानूनी कार्रवाई की जाए।”
छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के प्रदेश उपाध्यक्ष मोहन सिंह टेकाम कहते हैं कि “हम पिछले 4-5 सालों से व्यापक स्तर पर महिषासुर दिवस मना रहे हैं। प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में संगठन के माध्यम से शासन-प्रशासन को ज्ञापन भी सौंपे हैं ताकि हमारे सांस्कृतिक मूल्यों-मान्यताओं और आदर्शों का इस तरह अपमान और हमारी भावनाओं को ठेस न पहुंचायी जाए। रावेन आदिवासियों यानी अनार्यों के राजा थे, जैसे राम आर्यों के। दोनों की लड़ाई में एक की जीत और दूसरे की हार हुई तो उसमें दहन का क्या मतलब है? इस तरह के हत्याओं के जश्न का हम सामाजिक तौर पर निषेध करते हैं। यह कतई बर्दाश्त नहीं है। महिषासुर और रावेन आदिवासी समाज के आराध्य हैं। हिंदू जबरन दुर्गा के साथ महिषासुर की वध वाली मूर्ति दर्शाकर हमारे सांस्कृतिक मूल्यों-मान्यताओं को अपमानित कर रहे हैं।”

‘छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज’ द्वारा प्रदेश के लगभग सभी आदिवासी इलाकों में महिषासुर वध न दिखाने और रावेन दहन न मनाने के लिए शासन-प्रशासन को ज्ञापन सौंपा गया है, जिसमें मांग की गयी है कि कृपया आर्य हमारे आदर्श महिषासुर और रावेन को अपमानित करना बंद करे और प्रशासन इसके लिए सख्त रवैया अपनाये।
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‘छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज’ सूरजपुर जिलाध्यक्ष मोतीलाल पैकरा, जो पिछले 10 सालों से सरकारी नौकरी छोड़ आदिवासी समाज में चेतना जगाने का काम कर रहे हैं और 2 साल पहले सर्व आदिवासी समाज से जुड़े हैं, कहते हैं, “हम इस बार 19 अक्टूबर, 2018 को दशहरा पर ही महिषासुर शहादत दिवस और रावेन दिवस मनायेंगे। आदिवासी समाज लंबे वक्त से महिषासुर शहादत दिवस गांव-गिराम स्तर पर छोटे रूप में मनाते आ रहे हैं, मगर यह आयोजन अब सामूहिक स्तर पर वृहद रूप में आयोजित होने लगा है।”
पैकरा ने बताया कि “चार साल पहले सूरजपुर में छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज की शाखा गठित हुई, जो लगातार महिषासुर शहादत दिवस आयोजित कर रहा है। इस अवसर पर जिलेभर के हजारों-लाखों की संख्या में लोग हिस्सेदारी करते हैं। शासन-प्रशासन को ज्ञापन दे दिया गया है। अगर ब्राह्मणवादी लोगों ने इस बार भी हमारी भावनाओं-मान्यताओं को ठेस पहुंचा महिषासुर वध और रावेन दहन किया तो हम लोग उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करायेंगे। अगर एफआईआर पर भी कार्रवाई नहीं हुई तो आदिवासी समाज आंदोलन को बाध्य होंगे।”

पैकरा बताते हैं कि “हमने पिछले साल भी दुर्गा के साथ महिषासुर वध न चित्रित करने और रावेन दहन न करने के लिए प्रशासन को ज्ञापन सौंपा था, मगर हमसे कहा गया कि बहुत देर हो गयी अब कुछ नहीं हो सकता। इसीलिए इस बार हमने पहले ही ज्ञापन दे दिया है, ताकि प्रशासन के पास कोई बहाना न रह जाए। हमारा विरोध दुर्गा पूजा से नहीं महिषासुर वध दिखाए जाने से है, इसी तरह आप दशहरा मनायें मगर अनार्य के पूजनीय रावण का दहन न करें, यही हमारी मांग है।”
छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के संरक्षक नंदकुमार साय हैं, जो अभी राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी हैं। इसके अलावा यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे अरविंद नेताम भी इसके संरक्षक सदस्य हैं। सूरजपुर में ही इस संगठन से हजारों की तादाद में लोग जुड़ चुके हैं, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि महिषासुर शहादत दिवस में तकरीबन 4-5 हजार लोग हिस्सा लेते हैं। छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज आदिवासियों के संवैधानिक हक-अधिकारों, जल-जंगल-जमीन से जुड़े मामलों में जन-जागरुकता लाने का काम कर रहा है। आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा पर इसका विशेष जोर है।
(कॉपी-संपादन : राजन)
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