जेएनयू चुनाव : हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिसका वादा है!

जेएनयू छात्र संघ के परिणाम आ गए हैं। लेफ्ट यूनिटी पहले, एबीवीपी दूसरे और बापसा तीसरे नंबर पर रही है। वाम और दक्षिण, दोनों को कड़ी चुनौती दे रहा बहुजनवादी संगठन बापसा को आखिर किन शक्तियों ने तीसरे नंबर पर धकेल दिया? बता रहे हैं कनक केशरी

त्वरित टिप्पणी : जेएनयू चुनाव परिणाम 


सबसे पहले तो वही बताना चाहूंगा, जो आप जानना चाहते हैं। जेएनयू छात्र संघ के चुनाव में ‘लेफ्ट यूनिटी’ वाले संगठन की सेंट्रल पैनल की सभी चारों सीटों पर जीत पक्की हो चुकी है। एबीवीपी दूसरे नंबर पर रही है और बापसा तीसरे पर। लेख लिखे जाने तक वोटों की गिनती जारी है। उम्मीद है आज शाम तक परिणाम आ जाएंगे। अभी तक के अपडेट इस प्रकार हैं : 

गिने गए वोट-4709

कुल वोट– 5185

अध्यक्ष पद के लिए :

  • एन. साईं बालाजी(लेफ्ट)-1948
  • ललित पाण्डेय(एबीवीपी)-875
  • थल्लापल्ली प्रवीण(बापसा)-625
  • जयंत कुमार ‘जिज्ञासु'(छात्र राजद)-459
  • विकास यादव(एनएसयूआई)-367
  • साईब बिलावल(इंडिपेंडेंट)-120
  • निधि मिश्रा(सवर्ण छात्र मोर्चा)-54
  • जाह्नु कुमार हीर -(इंडिपेंडेंट)- 31

उपाध्यक्ष पद के लिए

  • सारिका चौधरी(लेफ्ट)- 2326
  • गीता बरुआ(एबीवीपी)- 918
  • पूर्णचंद्रा नाईक(बापसा)-594
  • लिजी के बाबू(एनएसयूआई)- 428

जेनरल सेक्रेटरी पद  के लिए

  • एजाज़ अहमद राथेर(लेफ्ट)-2207
  • गणेश गुर्जर(एबीवीपी)- 1128
  • विश्वभर नाथ प्रजापति(बापसा)-745
  • मो. मोफिजुल आलम (एनएसयूआई) -314

ज्वाइंट सेक्रेटरी पद के लिए

  • अमुथा जयदीप(लेफ्ट)- 1839
  • वेंकट चौबे(एबीवीपी)-1118
  • नुरेंग रीना (एनएसयूआई)-744
  • कनकलता यादव(बापसा)-616

नई दिल्ली के प्रसिद्ध जवाहर लाल विश्वविद्यालय (जेएनयू) के हजारों पूर्व विद्यार्थियों और शुभचिंतकों के लिए  15 और 16 सितंबर की दरम्यानी रात बेहद भारी गुजरी। फेसबुक और टि्वटर पर अहले सुबह तक चल रही उनकी गतिविधियां उनकी बेचैनी को बयां करती रहीं।

जेएनयू के पूर्व छात्र रहे पत्रकार, बहुजन तबके से अाने वाले उर्मिलेश ने फेसबुक पर अपनी बेचैनी को इन शब्दों में बयां किया, जेएनयू में जो कुछ हो रहा है, उसे पूरा देश देख रहा है! इस वक्त मैं दिल्ली से लगभग 1400 किमी दूर एक सुंदर इलाके में हूं। कल सुबह एक सेमिनार में बोलना है। पर न नींद आ रही है और न सेमिनार के लिए तैयारी हो पा रही है! नज़रें जेएनयू की तरफ लगी हैं! सिर्फ एक पूर्व छात्र होने के नाते नहीं, देश का नागरिक होने के नाते भी!  ये कैसा मंजर है! आखिर, हम कहां पहुंच गए हैं? रोहित बेमुला के ‘हत्यारे’ और गौरी लंकेश को गोलियों से छलनी करने वाले आज ‘शासकीय-प्रशासकीय संरक्षण’ में अपने कुकर्मों का नया निशाना खोज रहे हैं! एकता, संघर्ष और समझदारी से ही इस अभूतपूर्व खतरे से निपटा जा सकता है! फिलहाल, आइए, जेएनयू छात्र संघ चुनाव के वोटों की गिनती का इंतजार करें, इकबाल बानो के गाये, फ़ैज़ साहब के इस महान् गीत को सुनते हुए!” अपनी इस टिप्पणी के साथ उन्होंने फैज अहमद फैज के प्रसिद्ध नज्म का इकबाल बानो की आवाज में गाया गया वीडियो फेसबुक पर साझा किया – “हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, वो दिन कि जिसका वादा है!”

ऐसे हजारों लोग, जिनमें पत्रकार, राजनेता, नौकरशाह, प्राध्यापक, ऊंची कंपनियों के सलाहकार देश-विदेश में अपने विस्तरों पर फोन से चिपके पडे थे। जेएनयू के विद्यार्थी वोटो की गिनती के अपडेट लगतार सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे थे। कभी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् द्वारा मतगणना केंद्र में तोडफोड की खबर आती, तो कभी इस संगठन के सैकड़ों लाठी-डंडों से लैस समर्थकों के जेएनयू कैंपस में घुसने की तो कभी गोली चलने की अफवाह सोशल मीडिया पर तैरने लगती।

गहराती हुई रात के साथ वोटों की गिनती के एकदम आरंभिक चरण में जब एबीवीपी आगे बढने लगी, तो वाम दलों और बिरसा फुले आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन’ (बापसा ) के खेमों में एकदम सन्नाटा छा गया। जाहिर है इस आरंभिक रूझान से एबीवीपी के खेमे में उत्साह था। लेकिन एक और खेमा था, जो आरंभिक रूझान से बहुत प्रसन्न दिख रहा था। बहुजनवाद की प्रस्तावक कही जाने वाले फारवर्ड प्रेस के लिए जेएनयू चुनाव पर यह टिप्पणी लिखते हुए मैं इसी खेमे की खुशी-गम पर खुद को केंद्रित रखना चाहूंगा।

वाम दलों की आसन्न पराजय को देखकर खुश होने वाला वह खेमा था – छात्र राजद के समर्थकों का। आरंभिक रूझान में  जेएनयू में पहली बार चुनाव लड़ रहे इस संगठन के प्रत्याशी जयंत जिज्ञासु को वोटों की अच्छी संख्या प्राप्त होती दिख रही थी और वह बापसा से अागे थे। उनकी खुशी का मुख्य कारण भी यही था, कि वे बापसा से आगे हैं। सामाजिक न्याय के लिए लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले इस खेमे की यह खुशी किस प्रकार के भविष्य का इशारा करती है?

बापसा के प्रत्याशी

 

एबीवीपी कार्यकर्ता

आप जरा आरंभ में दिए गए वोटों को देखें। यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि बहुजनवादी छात्रों के वोटों का बंटवारा बापसा और छात्र राजद के बीच हुआ है। अगर छात्र राजद ने अपना उम्मीदवार न उतारा होता तो बहुजनवादी छात्र संगठन बापसा निश्चित रूप से दूसरे नंबर पर होता। लडाई वाम और बहुजन के बीच होती। पक्ष और विपक्ष दोनों ओर समतावादी संगठन होते। एबीवीपी तीसरे नंबर पर चली गई होती और उन्हें जेएनयू में मुख्य विपक्ष कहलाने का मौका न मिलता। जिस तरह से पिछले चुनावों में बापसा ने प्रदर्शन किया था, उसे देखते हुए यह भी मुमकिन था कि लेफ्ट यूनिटी के बावजूद वह बहुत कम संख्या से उनसे पीछे रहती और अगले चुनाव में इस यूनिटी को भी पछाड देती। लेकिन बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की कमान संभाल रहे तेजस्वी यादव की महत्वकांक्षा ने बहुजन एकता को न सिर्फ तोड डाला बल्कि उसे कई कदम पीछे भी धकेल दिया।

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चुनाव से पूर्व प्रेसिडेंशियल डिबेट में छात्र राजद के प्रत्याशी जयंत जिज्ञासु द्वारा दिए गए भाषण की काफी तारीफ हुई। साेशल मीडिया को ही गवाह मानें तो स्वयं तेजस्वी  यादव इस चुनाव पर लगातार नजर बनाए हुए थे और अपने समर्थकों को उत्साहित कर रहे थे। लेकिन यह देखना रोचक होगा कि ये समर्थक कौन थे? क्या वे ‘बहुजन’ थे या सिर्फ एक जाति के थे? जेएनयू में उन्होंने छात्र राजद के प्रत्याशी के रूप में जयंत जिज्ञासु को चुना, जो उनकी अपनी जाति के हैं। चुनाव से ठीक पहले जेएनयू में पिछले कुछ वर्षों से सक्रिय ‘ओबीसी फोरम’ तोड़ दिया गया। फोरम में कार्यरत लोगों पर तेजस्वी यादव के इशारे पर यादववाद करने के आरोप लगे। इस फोरम के यादव जाति से जुडे विद्यार्थियों ने छात्र राजद के लिए प्रचार किया जबकि बापसा ने ओबीसी फोरम से संबंद्ध रहे अतिपिछड़ी जाति से आने वाले विश्वभर नाथ प्रजापति को जेनरल सेकरेट्री पद के लिए  तथा ज्वाइंट सेक्रेटरी पद के लिए यादव जाति से आने वाली कनकलता यादव को अपना उम्मीदवार बनाया। इस प्रकार पिछड़ी जाति के मत न केवल टुकडों में बंट गये बल्कि ओबीसी फोरम जैसी संस्था भी इस चुनाव के कारण बिखर गई।

जेएनयूएसयू चुनाव से पूर्व जारी ओबीसी फोरम का पर्चा : हमारा फोरम एक एनजीओ है!

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हालात यह हो गई कि ओबीसी फोरम के कुछ सदस्यों ने चुनाव से पहले एक पर्चा जारी किया गया, जिसने फोरम के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोगों सन्न कर दिया। इस पर्चे में कहा गया कि ओबीसी फोरम सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड है। यानी, यह एक एनजीओ है। पर्चे में कहा गया कि चुंकि यह एक एनजीओ है, इसलिए इसके बारे में किसी को राजनीतिक टीका-टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है।  सिर्फ इसके ‘रजिस्टर्ड’ पदाधिकारी ही इसके बारे में बयान दे सकेंगे। अगर किसी ने अनाधिकृत चेष्टा की तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। राजनीतिक रूप से सक्रिय एक एक सामाजिक संगठन को एनजीओ के रूप में प्रचारित करना अनायास नहीं है। जिन पार्टियों के सुप्रीमो उन्हें प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह चलाते रहे हों,उनके समर्थक अगर अपने संगठनों को एनजीओ घोषित कर रहे हों तो इसमें कैसा आश्चर्य!

बहरहाल, जेएनयू चुनाव के अंतिम परिणाम घोषित होने अभी बाकी हैं।  फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि छात्र राजद के प्रादुर्भाव ने जेएनयू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को मदद पहुंचाई है तथा बहुजन एकता को छिन्न-भिन्न किया है।

अंत में  फैज को उद्धृत करते हुए यह कहा जा सकता है कि – “हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिसका वादा है”, लेकिन उसके लिए हमें अपनी गलतियों से सीखना होगा।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क/सिद्धार्थ/रंजन)


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