पदोन्नति में आरक्षण : क्या था विरोधियों का तर्क और कैसे किया सुप्रीम कोर्ट ने खारिज?

अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सरकारी कर्मियों को सामाजिक भेदभाव का शिकार नहीं होना पड़ता है। एक बार सरकारी नौकरी प्राप्त होने पर वे इतने संपन्न हो जाते हैं कि उन्हें आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए। आरक्षण विरोधियों के इन तर्कों को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने खारिज किया। फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट :

ऐसे देखें तो मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने बीते 26 सितंबर, 2018 को पदोन्नति में एससी, एसटी वर्ग के कर्मियों के आरक्षण पर जो फैसला सुनाया है उसमें स्पष्टतः एक ही बात कही गई है कि अनुसूचित जाति और जनजाति में पिछड़ेपन को साबित करने के लिए अब किसी भी तरह के आंकड़ों की जरूरत नहीं पड़ेगी और एम नागराज मामले में इस तरह की शर्त को लगाना गलत था। लेकिन पीठ ने चर्चा लगभग उन सभी मुद्दों पर की है जिसको लेकर याचिकाएँ दायर की गई थीं।

संविधान पीठ ने इसका विरोध करने वालों के सभी तर्कों को खारिज ही नहीं किया बल्कि हास्यास्पद भी करार दे दिया। विरोधी पक्ष के पैरवीकार अधिवक्ता राजीव द्वीवेदी ने तर्क दिया था कि जब अनुसूचित जाति और जनजाति का कोई व्यक्ति निचले पदों से ऊंचे पदों पर जाता है तो अस्पृश्यता और पिछड़ेपन को वह पीछे छोड़ चुका होता है।

पीठ ने उनके इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि अगर इस दलील को मान लिया जाए तो कोर्ट को अनुच्छेद 16(4-ए) को निरस्त करना पड़ेगा क्योंकि उस स्थिति में ऊंचे पदों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण देने की तब कोई जरूरत ही नहीं रह जाएगी। साथ ही कहा कि यदि ऐसा हुआ तब सरकारी सेवाओं में वंचित तबके के लोग नजर ही नहीं आयेंगे।

यह भी पढ़ें : पदोन्नति में एससी-एसटी को रिजर्वेशन का रास्ता साफ, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

वहीं क्रीमीलेयर के सवाल पर संविधान पीठ ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य पिछड़ी जातियों को समाज के अन्य नागरिकों के साथ समान आधार पर आगे बढ्ने के योग्य बनाना है। यह उद्देश्य प्राप्त नहीं होगा अगर आरक्षण का लाभ उस वर्ग के सबल वर्ग को ही मिलता रहे और शेष लोग पिछड़े ही बने रहें। पीठ ने कहा कि कोर्ट जब क्रीमी लेयर के मामले को अनुसूचित जाति और जनजाति पर लागू करता है तो वह अनुच्छेद 341 और 342 के तहत राष्ट्रपति की सूची में शामिल वर्गों से कोई छेड़छाड़ नहीं करता। इस सूची में दर्ज जाति या समूह अपरिवर्तित रहते हैं। आरक्षण के लाभ से सिर्फ उन्हीं लोगों को अलग किया जाता है जो अस्पृश्यता और पिछड़ेपन को पीछे छोड़ चुके हैं। कोर्ट का कहना था कि जब अनुच्छेद 14 और 16 के तहत आरक्षण के सिद्धांत को लागू किया जाता है, तो उस उप-समूह में मौजूद क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से वंचित किया जाता है।  

क्रीमी लेयर केवल पहचान का सिद्धांत न कि समानता का

पीठ ने कहा कि जब अनुच्छेद 14 और 16 को अनुच्छेद 341 और अनुच्छेद 342 के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से व्याख्या की जाती है, तो स्पष्ट होता है कि अगर संसद चाहे तो उपलब्ध संगत आंकड़ों के आधार पर किसी वर्ग को राष्ट्रपति की सूची से बाहर कर सकता है या उसमें जोड़ सकता है। इसी तरह, संवैधानिक अदालतें, जब वह आरक्षण के सिद्धांतों को लागू करती हैं, तो वह अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के सिद्धांतों को लागू करने के क्रम में इस तरह के समूह या उप-समूह से क्रीमी लेयर को हटाने का अधिकार रखती हैं। कोर्ट ने कहा कि इस बारे में वह अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत सरकार के मामले में मुख्य न्यायाधीश बालाकृष्णन के इस बयान से इत्तेफ़ाक नहीं रखता कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत सिर्फ पहचान का एक सिद्धांत है न कि समानता का सिद्धांत।  

सर्वोच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा

कोर्ट ने कहा कि इसलिए क्रीमी लेयर पर नागराज मामले में आया निर्णय कहीं से भी अनुच्छेद 341 और 342 के तहत संसद के अधिकारों से छेड़छाड़ नहीं करता और वह समझता है कि इस फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है। इसलिए इस मामले को सात जजों के वृहत्तर संविधान पीठ को सौंपने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि नागराज मामले में फैसला पाँच जजों की पीठ ने दिया है और यह फैसला 2006 से अभी तक टिका हुआ है और कई मामलों में इस फैसले का हवाला दिया गया है। किसी संविधान संशोधन से संविधान के मौलिक स्वरूप से छेड़छाड़ तो नहीं हुआ है यह जाँचने के लिए नागराज मामले में जिन बातों का जिक्र किया गया है उसको सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यों की पीठ ने आई. आर. कोएल्हो (मृत) द्वारा एलआर बनाम तमिलनाडु राज्य एवं अन्य (2007) मामले में सही ठहराया है।

यह भी पढ़ें : संविधान के परे नहीं है ओबीसी को पदोन्नति में आरक्षण

पिछड़ापन सिद्ध करने का मामला

पीठ ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जो कि अनुच्छेद 341 और 342 के तहत अधिसूचित हैं, उन्हें पहले से ही पिछड़ा माना जाएगा और उस स्थिति में उनके पिछड़ेपन को सिद्ध करने के लिए किसी भी तरह के क्वांटिफिएबल डाटा की जरूरत नहीं है। दूसरा, यह राज्यों पर नहीं छोड़ा गया है कि वे बताएं कि अनुसूचित जाति और जनजाति को किसी वर्ग के पदों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व है कि नहीं बल्कि यह इस वर्ग के लोगों को मिले आरक्षण के प्रतिशत के बराबर होगा। हम यह कह चुके हैं कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पिछड़ेपन को बताने के लिए किसी भी तरह के आंकड़ों की जरूरत नहीं है और इस बारे में नागराज मामले का फैसला गलत था और इसे वापस लिया जाता है। पर जहां तक प्रतिनिधित्व की बात है, अनुछेद 16(4A) में अनुसूचित जाति और जनजाति की जनसंख्या के अनुपातों का जिक्र नहीं है और इसे अनुच्छेद 330 के बरक्स देखना जरूरी है। अनुच्छेद 46 जो कि राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा है, उसने हमेशा ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों में अंतर किया है। अनुच्छेद 16(4) में जिस ‘पिछड़े वर्गों’ की चर्चा की गयी है वह अनुच्छेद 46 के ‘कमजोर वर्गों’ के बराबर है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की चर्चा अनुच्छेद 46 और 16(4) के अंत में की गयी है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज के सर्वाधिक कमजोर वर्गों में हैं और वे कमजोरों में भी कमजोर वर्ग में शुमार हैं। और इसलिए इनको पिछड़ा माना गया है।

(कॉपी संपादन : राजन/एफपी डेस्क)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। हमारी किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्कृति, सामाज व राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के सूक्ष्म पहलुओं को गहराई से उजागर करती हैं। पुस्तक-सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply