ऐतिहासिक गलतियों से सबक लेने की आवश्यकता

इतिहास बताता है कि हम अतीत में भी लड़ते रहे हैं। उन लड़ाइयों में हमने इतनी हिंसा की है, जिसका कोई हिसाब नहीं। क्या आज हम अतीत की उन लड़ाइयों की नयी व्याख्या के नाम पर एक बार फिर एक दूसरे के खिलाफ खंजर उठा लें? क्या इतिहास की गलतियों को आज दुरुस्त किया जा सकता है?

जन-विकल्प

इतिहास से सबक

नयी धारा के विकसित न होने के कुछ कारण थे, जिनमें प्रमुख था हमारा राष्ट्रीय आंदोलन। सभी उत्पीड़ित राष्ट्रों में मुक्ति आंदोलनों की कुछ विशेषताएं होती हैं, कुछ कमियां भी होती हैं। भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की भी थी। पहली बात तो यह उभर कर आती है कि राष्ट्रीयता के इस ज्वार ने धीमी गति से ही सही, लेकिन निरंतरता में चल रहे समाज सुधार के आंदोलनों को हतोत्साहित किया। इसकी स्पष्ट परिणति 1895 के पुणे कांग्रेस में उभर कर सामने आई। कांग्रेस की स्थापना के दस साल हो चुके थे। महाराष्ट्र में महादेव गोविंद रानाडे एक प्रमुख समाजसेवी थे, जिनकी प्रेरणा और प्रयासों से प्रति वर्ष कांग्रेस के मंच से ही सोशल कॉन्फ्रेंस की बैठक होती थी। यह बैठक कांग्रेस ख़त्म हो जाने के उपरांत होती थी। जाहिर है कांग्रेस से जुड़े हुए कुछ नेता ही इस संगठन से जुड़े थे। सोशल कॉन्फ्रेंस दलित और पिछड़े सामाजिक समूहों के लिए कार्य करती आई थी। इस मामले में इस संस्था ने थोड़ी ख्याति अर्जित की हुई थी। 1895 में पुणे कांग्रेस के आयोजक और स्वागत मंत्री बालगंगाधर तिलक ने घोषणा कर दी कि कांग्रेस के मंच पर यदि सोशल कॉन्फ्रेंस की बैठक हुई तो वह पंडाल फूंक देंगे। तिलक का पुख्ता जनाधार था और उनकी धमकी का कुछ मतलब होता था। रानाडे और कॉन्फ्रेंस से जुड़े लोगों की हिम्मत नहीं हुई कि वह यह आयोजन कर सकें। वे पीछे हट गए, चुप लगा गए। कांग्रेस का समाज सुधार के मुद्दे से अलगाव हो गया। डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब ” व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन डू टू द अनटेबुल्स” का आरम्भ इसी प्रसंग से किया है। तिलक का जुझारू राष्ट्रवाद समाज-सुधार-आंदोलनों के बलिदान बिना संभव नहीं था।

समाज सुधार के आंदोलन आखिर क्या थे? वस्तुतः यह समाज पर हावी तबकों के विरुद्ध उत्पीड़ित तबकों का मौन किन्तु सक्रिय प्रतिरोध था। ऐसा नहीं था कि प्रतिरोध करने वाले उत्पीड़ित तबकों के ही लोग थे। स्त्रियों के सवाल, ख़ास कर सती प्रथा और विधवा-विवाह जैसे मुद्दों को किसी स्त्री ने नहीं, बल्कि राजाराममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे पुरुषों ने उठाया था। अछूतों और स्त्रियों के सवाल को उठाने वाले जोतिबा फुले भी स्वयं अछूत या स्त्री नहीं थे। लेकिन समाज के प्रश्रय प्राप्त वर्चस्वशाली तबके ने इन सुधारों का विरोध किया, क्योंकि ये सुधार और प्रतिरोध के स्वर उनके निहित स्वार्थों पर हमला करते थे। समाज का वर्चस्वशाली वर्ग कौन था, इसकी व्याख्या जरुरी नहीं है। उत्पादन के साधनों और धार्मिक संस्थाओं पर जिनका कब्जा था, वही लोग वर्चस्व में थे। ये थे जमींदार, सामंत, पुरोहित और व्यापारी तबके के लोग। इनसे जो वर्ग बनता था, वह भारतीय दायरे में ऊँची कही जाने वाली हिन्दू-मुस्लिम जातियों का समूह था। समाज के तमाम संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए इस तबके की पूरी कोशिश होती थी कि शेष तबकों को नागरिक अधिकारों से भरसक दूर रखा जाय। यह वर्चस्वशाली तबका स्वयं को ही राष्ट्र मानता था। साम्प्रदायिकता-पसंद और सेकुलर लोगों में इतना ही अंतर था कि सांप्रदायिक शक्तियों का हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्र अलग-अलग था और सेकुलर शक्तियों का राष्ट्र हिन्दुओं और मुसलमानों के वर्चस्वशाली तबके की इकट्ठे बात करता था। मिहनतक़श तबकों की चिंता दोनों धड़ों में से किसी को नहीं थी। इसलिए यह राष्ट्र और राष्ट्रवाद बहुत अधिक एकांगी को संकीर्णमना था। जनता के बहुत छोटे-से हिस्से की नुमाइंदगी इसके माध्यम से हो रही थी। यह पूरे हिंदुस्तान की धड़कन नहीं थी, जैसा कि इन लोगों का झूठा दावा था।

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इतिहास लेखन में इस तरह के राष्ट्रवाद ने हमेशा ही व्यवधान खड़ा किया। तथाकथित राष्ट्रवादी ताकतें एक ऐसे दृष्टिकोण की वकालत करती थीं, जिनसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन को बल मिले। यह इसलिए कि यह साम्राज्यवाद उनके स्वार्थों को अपने हाथों में ले चुका था। भारतीय समाज के ऊँचे तबके का यह राष्ट्र बहुत ही संकुचित अर्थों वाला था। इसने भारतीय जन गण की कमजोरियों, आतंरिक सामाजिक संघर्षों, जमींदार-सामंत तबके के विरोध में चल रहे जन विद्रोहों इत्यादि की अनदेखी की। इनके मिले-जुले प्रयासों से भारतीय इतिहास कुछ तथाकथित वीर-बहादुर हस्तियों की गाथा बन कर रह गया था। हालांकि इस बीच गंभीर अकादमिक अध्ययनों और पुरातात्विक साक्ष्यों को नकारना किसी के लिए भी मुश्किल हो गया था। लेकिन इतिहास लेखन का वर्गीय नजरिये से पूरी तरह मुक्त होना असंभव दीखता था। स्थिति यहां तक बन आयी थी कि राष्ट्रवादी और सेकुलर इतिहासकारों में कोई बड़ा फर्क नहीं दीखता है, जो दिखना चाहिए था। जैसे एक प्रसंग 1857 को लें। इसे लेकर इस घटना के लगभग पचास साल बाद एक राष्ट्रवादी इतिहासकार दामोदर विनायक सावरकर ने 1909 में एक किताब लिखी – “द वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस, 1857″। इन्ही सावरकर ने आगे चल कर हिंदुत्व का फलसफा दिया था। इस किताब में उन्होंने प्राच्यवादी ज़माने के भारतीय और यूरोपीय इतिहासकारों के इस मत का विरोध किया कि 1857 की घटना एक उच्छृंखल अराजकता थी।

सावरकर ने उसे राष्ट्रीय विद्रोह माना और इसे राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम संघर्ष कहा। 1857 का वह विद्रोह या संघर्ष अपनी कुछ विशिष्टताएं लिए हुए था। आज जब राष्ट्रीय आंदोलन ख़त्म हो चुका है, तब उचित यही है कि उसका वैज्ञानिक और संतुलित दृष्टिकोण से अध्ययन होता। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। हिंदुत्ववादी नजरिये से यदि सावरकर को यह राष्ट्रीय संघर्ष दिखा तो मार्क्सवादियों के बड़े हिस्से को भी ऐसा ही कुछ दिखा। स्थिति और भी नाजुक तब दिखती है जब रजनी पाम दत्त जैसे अप्रवासी भारतीय मार्क्सवादियों को वह घटना एक सामाजिक प्रतिक्रियावाद के रूप में दीखता है, लेकिन हिंदुस्तान में रह रहे मार्क्सवादियों को इसके ठीक विपरीत यह एक क्रांति के रूप में नजर आती है। भारतीय मार्क्सवादी और हिंदुत्ववादी अपने दृष्टिकोण में यदि एक साथ हैं, तब इसके कारण उनके वर्गीय-वर्णीय समान-स्वार्थ के अलावा और क्या हो सकते हैं?

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यह अवश्य है कि भारतीय राष्ट्रवाद का भी क्रमिक विकास होता गया है। आरंभिक दौर का अंग्रेज-विरोधी अंध राष्ट्रवाद, फिर हिन्दू, मुस्लिम और गंगा-जमुनी राष्ट्रवाद और अंततः विकसित होता हुआ एक मुक्कमल राष्ट्रवाद सामने आता है। इसे हम सम्यक राष्ट्रवाद भी कह सकते हैं। इसे विकसित करने का श्रेय समाजवादियों और उन सामाजिक वामपंथियों को जाता है, जिन्होंने किसानों-मजदूरों, दस्तकारों, स्त्रियों और दलित-पिछड़े सामाजिक समूहों को वास्तविक राष्ट्र मानाने की वकालत की। इन लोगों ने ज़मींदारों, सामंतों, पुरोहितों और समाज के वर्चस्वशाली कही जानेवाली सवर्ण या अशराफ जाति समूहों की सामाजिक चिंतन-धारा को निरस्त करने की कोशिश की। इस राष्ट्रवाद ने समग्रता के साथ एक नए इतिहास-बोध की प्रस्तावना की। हालांकि इन लोगों ने कभी अपने माथे राष्ट्रवाद की कोई कलगी नहीं लगाई। ये अधिक से अधिक इतिहास की मार्क्सवादी व्याख्या और कुछ दशक पूर्व निम्नवर्गीय अथवा मातहत तबकों (सबाल्टर्न ) की दृष्टि को लेकर इतिहास-संधान की कोशिशें की। इसके नतीजों ने भारतीय इतिहास को एक नया रंग, एक नया रूपाकार देना आरम्भ किया है। संभवतः इतिहास का यह अधिक विश्वसनीय प्रारूप होगा। यह दौर अभी चल रहा है, इसलिए इसके नतीजों का हमें और इन्तजार करना है।

लेकिन इन सबके साथ यह प्रश्न तो आता ही आता है कि हम इस इतिहास-आख्यान को लेकर क्या करेंगें? अतीत की इस पूरी व्याख्या का हमारे लिए क्या महत्व होना चाहिए। हम अतीत में भी लड़ते रहे हैं। उन लड़ाइयों में हमने इतनी हिंसा की है, जिसका कोई हिसाब नहीं। क्या आज हम अतीत की उन लड़ाइयों की नयी व्याख्या के नाम पर एक बार फिर एक दूसरे के खिलाफ खंजर उठा लें? क्या इतिहास की गलतियों को आज दुरुस्त किया जा सकता है? शायद नहीं। हम इतिहास को सुधार नहीं सकते। उससे केवल सबक ले सकते हैं। सुप्रसिद्ध विद्वान हज़ारीप्रसाद द्विवेदी इतिहास की शव-साधना की बात करते थे। औघड़ी संस्कृति में कापालिक साधक किसी शव को पेट के बल लिटा कर उसकी पीठ पर बैठ जाता है। फिर आहिस्ता-आहिस्ता शव के मुंह को अपने मुंह की तरफ मोड़ता है। उससे रु-ब-रु होना चाहता है। इसे ही शव-साधना कहते हैं। आज हम इतिहास अथवा अतीत-आख्यान को अपने वर्तमान की समस्याओं अथवा जरूरतों से रु-ब-रु करते-कराते हैं, तब उससे कुछ सबक ले सकते हैं। लेकिन इतिहास की मूर्खताओं के हवाले हमने स्वयं को कर दिया, तब कोहराम खड़ा होना लाजिमी है। इतिहास की व्याख्या हम स्वयं करते हैं। उससे उठे कोहराम को भी हमें ही झेलना होगा। लेकिन यदि कोई सबक हमें लेनी है तो यही कि इतिहास केवल इतिवृत है, जो यह बतलाता है कि तमाम मार-काट ,युद्ध और कोहराम के बाद लोग अफ़सोस करते हैं, रोते हैं, पश्चाताप करते हैं। इसलिए श्रेय यही है कि हम मिल-ज़ुल कर रहें। प्रेम और सद्भाव के साथ जीने की कोशिश करें। न केवल मनुष्य जाति,अपितु सम्पूर्ण प्रकृति की हम चिंता करें। यही हमारी पौराणिकता का भी सार है और इतिहास का भी।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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