झारखंड : मनुवादी ताकतों के कारण बढ़ रहीं डायन के नाम पर हत्याएं

सामाजिक कार्यकर्ता वंदना टेटे के मुताबिक, जहां तक आदिवासी समाज में डायन के नाम पर की जा रहीं हत्याओं का मामला है उसके कारणों में आदिवासी समाज के भीतर बाहरी तत्वों की घुसपैठ है। इस तरह की घटनाओं में वृद्धि हुई है। आदिवासी समाज कभी एक समूह हुआ करता था अब वह व्यक्तिगत होता जा रहा है। विशद कुमार की खबर

झारखंड आदिवासी-बहुल राज्य है। यह राज्य इन दिनों आए दिन महिलाओं को डायन कहकर प्रताड़ित करने एवं उनकी हत्या किए जाने के मामलों के कारण कुख्यात हो रहा है। यहां के बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन घटनाओं के पीछे मनुवादी ताकतें हैं। उनके मुताबिक, आदिवासियों के पर जबरन हिन्दू धर्म थोपा जा रहा है। वहीं कुछ इसकी वजह यह भी बता रहे हैं कि झारखंड में आय के साधन पहले सामूहिक हुआ करते थे, जो अब व्यक्तिगत होते जा रहे हैं। जमीन की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि के कारण भी हालात में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। 

अपने ही ले रहे अपनों की जान

बीते 15 सितंबर, 2020 को राज्य की राजधानी रांची के बेड़ो थाना के इलाके में नेहालु पंचायत के रोगाडीह पतरा टोली गांव में अल सुबह डायन के शक में एक दंपत्ति की हत्या कर दी गई। मृतकों में 75 वर्षीय मंगरा उरांव और उनकी 55 वर्षीया पत्नी बिरसी उराइन थे। इन दोनों की हत्या ग्रामीणों ने मिलकर की। भीड़ इन दोनों को लाठी-डंडों से तब तक पीटती रही जब तक कि दोनाें अचेत नहीं हो गए। बिरसी उराइन ने मौका-ए-वारदात पर ही दम तोड़ दिया जबकि उनके पति मंगरा उरांव की मौत उसी दिन शाम हो गई। 

डायन के नाम पर हत्या मामले में झारखंड शीर्ष पर

इस घटना के संबंध में मृतक दंपत्ति के पुत्र सोमरा उरांव द्वारा बेड़ो थाने में हत्या का मामला दर्ज कराया गया है। सोमरा उरांव के अनुसार, उनकी मां बिरसी की कुछ दिनों से मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। वह अक्सर रात में घर से बाहर निकल जाया करती थी। 14 सिंतंबर की रात भी करीब एक बजे वह घर से निकल गई थी। इसके बाद मंगरा उरांव उसे वापस ले आए। सोमरा उरांव के मुताबिक, सुबह गांव के अखरा (सामुदायिक स्थल) के पास उसकी मां मृत पड़ी हुई मिलीं। वहीं उसके पिता घायल थे, जिन्हें बेड़ो अस्पताल ले जाया गया। शाम को उनकी मौत गई। सोमरा ने पुलिस को बताया कि गांव के करीब डेढ़ सौ लोगों ने डायन बिसाही के आरोप उनके मां-पिता की हत्या कर दी है।  

इस घटना के 6 दिन पहले यानी 9 सितंबर, 2020 को गुमला जिले के घाघरा थाना क्षेत्र के सलामी गांव में इसी तरह की एक घटना घटित हुई। करीब 75 वर्षीय शनिचरिया देवी को डायन बताकर गांव के ही पांडु उरांव ने डंडे से पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी। इस मामले में ग्रामीणों ने पुलिस के डर से आरोपी पांडु उरांव को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस के मुताबिक आरोपी पांडू उरांव मानता है कि वृद्धा डायन थी। उसके टोने के कारण उसकी मां और पत्नी हमेशा बीमार रहतीं थीं। साथ ही, लगभग 20 वर्ष पूर्व उसके पिताजी को भी वृद्ध महिला ने जादू करके मार दिया था।

ओबीसी जातियों में भी डायन कुप्रथा

अंधविश्वास के इस मकड़जाल में जिस तरह से गांव के लोग फंसे हुए हैं, वह चिंता का विषय तो है ही, खतरनाक भी है। लोग अपने ही लोगों की जान के दुश्मन बन रहे हैं। यह एक अंतहीन सिलसिला है। बीते 17 अगस्त, 2020 को गिरिडीह के गांवा थाना क्षेत्र के खेसनरो गांव में एक 30 वर्षीय महिला गीता देवी को डायन बता कर कुल्हाड़ी एवं लाठी से मार कर हत्या कर दी गयी। बताया जाता है कि खेसनरो गांव निवासी मनोज यादव की पत्नी गीता देवी को बीते कई सालों से कुछ लोगों द्वारा डायन बता कर लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था। जब वह 17 अगस्त की सुबह अपने घर आ रही थी तब 15-20 की संख्या में कुछ लोगों ने उस पर लाठी-डंडे व कुल्हाड़ी से हमला कर दिया। इसके कारण घटनास्थल पर ही उसकी मौत हो गई। इस मामले में मृतकों की सास व बेटी ने पड़ोस में रहने वाले मुंशी महतो, मंजू देवी, मालती देवी, कालिका कुमारी, सपना देवी, कपिल यादव, दिलीप यादव, सुनीता देवी, धनराज यादव सहित 15-20 लोगों पर हत्या का आरोप लगाया है।

महिला का सिर काट कर  थाने पहुंचा

वहीं 7 जुलाई, 2020 को साहिबगंज जिले के राधानगर थाना क्षेत्र की मोहनपुर पंचायत के मेंहदीपुर गांव की मतलू चौराई नामक एक 60 वर्षीय महिला की हत्या गांव का ही सकल टुडू ने डायन बताकर कर दी। उसे शक था कि महिला ने उसके बेटे को जादू टोना कर मार दिया है। इस हत्या का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि वृद्धा मतलू चौराई की हत्या गांव के सकल टुडू ने 7 जुलाई को गला काट कर दी और कटे हुए सिर को हाथ में लेकर लेकर 8 जुलाई की सुबह थाने पहुंच गया। इस लोमहर्षक दृश्य से सभी अवाक रह गए। 

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बताते चलें कि सकल टुडू का 25 वर्षीय बेटा साधिन टुडू बीमार था। उसे सर्दी-खांसी थी और इलाज नहीं होने की वजह से उसकी मौत हो गई। उसकी मौत के बाद गांव में यह अफवाह फैल गई कि जादू टोना कर मतलू चौराई ने उसकी जान ले ली। इस घटना से ठीक दो दिन पहले 4 जुलाई, 2020 को रांची के लापुंग थाना क्षेत्र के चालगी केवट टोली के दो भाइयों हेमंत होरो व बुधुआ होरो ने अपनी ही चाची 56 वर्षीया फुलमनी होरो की डायन होने के संदेह में हत्या कर दी। दोनों भाइयों के पिता बीमार रहते थे और उन्हें यह संदेह था कि उनकी चाची ने उन्हें टोना कर दिया है, जिससे उसके पिता बीमार हैं।

आंकड़े बता रहे भयावह स्थिति 

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में डायन होने के संदेह में हत्या के मामलों में झारखंड शीर्ष पर है। रिपोर्ट बताती है के देश भर में पिछले पांच वर्षों (2015-20) में डायन के नाम 656 हत्याएं हुई हैं, जिनमें से 217 झारखंड में हुईं । 

बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर में क्या है कारण?

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इन समुदायों में ऐसी वृति क्या अशिक्षा के कारण है? इसके जवाब में आदिवासी मामलों की जानकार वंदना टेटे कहती हैं, “अंधविश्वास व अशिक्षा हर समाज में है, बावजूद इसके आदिवासी समाज पर ज्यादा फोकस इसलिए होता है कि सामान्य समझ में आदिवासी व दलित ही अशिक्षित होते हैं।” वे आगे कहती हैं कि “जहां तक आदिवासी समाज में डायन के नाम पर की जा रहीं हत्याओं का सवाल है, तो उसके कारणों में आदिवासी समाज में बाहरी तत्वों की घुसपैठ है। इस कारण इस तरह की हत्याओं में वृद्धि हुई है। जो आदिवासी समाज कभी एक समूह हुआ करता था, वह व्यक्तिगत होता जा रहा है। आजीविका के संसाधन, जो आदिवासी समाज में सामूहिक हुआ करते थे, अब व्यक्तिगत होने की ओर बढ़ रहे हैं। इसका कारण है आदिवासी समाज में कारपोरेट दलालों की घुसपैठ। वे आदिवासियों को उनकी जमीन की कीमत बताने लगे हैं, ताकि आने वाले दिनों में उनकी जमीन को आसानी से कारपोरेट के हवाले किया जा सके।”

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टेटे कहती हैं कि “डायन के नाम पर महिलाओं की हत्या के पीछे खास कारण यह भी है कि महिलाएं जमीन के प्रति ज्यादा सजग होती हैं। इस तरह की घटनाओं में अन्य महिलाएं खामोश रहती हैं और घुसपैठिए आसानी से पुरूषों को अपने पाले में करके उनकी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। इसलिए डायन के नाम पर उन्हें टारगेट किया जा रहा है।”

वहीं आदिवासी साहित्यकार डॉ. शांति खलखो बताती हैं कि इन घटनाओं के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण तो यही है कि महिलाओं को दोयम दर्जे का माना जाता है। शिक्षा व अज्ञानता भी महत्वपूर्ण कारण हैं। साथ ही संपत्ति के लोभ में भी इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। डॉ. खलखो बताती हैं कि डायन जैसी  कुप्रथा आदिवासियों की संस्कृति में नहीं रही है। हम आदिवासियों की संस्कृति प्रकृति-आधारित होती है। इसमें प्रेम और सामूहिकता निहित है। लेकिन ब्राह्मणवादी ताकतों ने इस कुप्रथा को बढ़ाया है। वे हम आदिवासियों की संस्कृति पर हमला कर रहे हैं।

झारखंड में लागू है बिहार का कानून, लेकिन अमल नहीं

वहीं डायन कुप्रथा पर ‘डायनगाथा’ (2009) किताब लिख चुके प्रो. संजय बसु झारखंड पुलिस के आंकड़ों पर भी संदेह जताते हैं। उनका कहना है कि झारखंड पुलिस के आंकड़े भी कम हैं। राज्य में डायन हत्या एक बड़ी समस्या है, शायद इसीलिए सरकारी मशीनरी सही आंकडें छिपाना चाहती है। साथ ही झारखंड में इस कुप्रथा की रोकथाम के लिए अलग से कोई कानून नहीं है। अभी तक संयुक्त बिहार का “डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम 1999” ही झारखंड में लागू है, जिसे राज्य सरकार ने 3 जुलाई, 2001 को अंगीकृत किया था। इसके अनुसार डायन बता कर जुल्म करनेवाले को 5 से 10 साल की सजा और 1 से 5 लाख रुपए तक का जुर्माना भरना होगा। अगर ऐसे किसी काम में किसी समूह को दोषी पाया जाता है, तो उस समूह के हर व्यक्ति को 5 से 30 हजार रुपए तक का जुर्माना देना होगा। डायन बता कर किसी की हत्या करने पर धारा 302 के तहत मुकदमा चलेगा। इसी प्रकार डायन बता कर यदि किसी को आत्महत्या के लिए मजबूर किया जाता है, तो उसे 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा और 1 से 5 लाख रुपए तक का जुर्माना देना होगा। कानून में यह भी प्रावधान है कि ऐसे मामलों की जांच में कोताही बरतने वाले जांच अधिकारी को भी दंड मिलेगा। उसे भी 10 हजार रुपए का जुर्माना भरना होगा।

प्रो. बसु के मुताबिक राज्य में कानून है, लेकिन इसका अमल नहीं किया जा रहा है। यहां तक कि पुलिसकर्मियों को भी इस कानून की पूरी जानकारी नहीं है। साथ ही इस कानून को लोगों के बीच प्रचारित नहीं किया जा रहा है। इस स्थिति में बदलाव संभव है यदि पुलिस और लोगों के बीच इस कानून की जानकारी बढ़ाई जाय। 

(संपादन : नवल/अमरीश)


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