आंबेडकर के विचारों को विकृत करने में कौन-कौन शामिल हैं?

आंबेडकर को ट्रेजड़ी का शिकार कैसे बनाया गया? उनके विचारों को खंडित करके कैसे विरूपित और विकृत किया जा रहा है? द्विज संस्कृति की समर्थक शक्तियाें, वामपंथियों या तथाकथित आंबेडकरवादी आंदोलन के झंडाबरदारों की इसमें किस प्रकार की भूमिका रही है? बता रहे हैं डॉ. सिद्धार्थ :

इतिहास इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करता है कि युग-पुरूषों को अक्सर ही ट्रेजड़ी का शिकार होना पड़ा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह होती है कि अपने युग की, जिस महान हलचल की वे पैदाईश होते हैं, साथ ही जिसे  गति और दिशा देते हैं, वह एक मंजिल पर पहुंच कर ठहराव का शिकार हो जाती है। यह उनके जीते जी या मृत्यु के वर्षों बाद हो सकता है। यह ट्रेजड़ी अक्सर इस रूप में घटती है कि आजीवन वे जिन मूल्यों और अन्यायों के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं, उन्हें उसका ही समर्थक साबित कर दिया जाता है और उनके दर्शन, विचारों, सपनों और जीवन-यात्रा की समग्रता को खंडित करके विभिन्न अवसरवादी शक्तियां अलग-अलग टुकड़ों का अपने हित-लाभ के लिए इस्तेमाल करती हैं।

इस प्रक्रिया में युग पुरूष का असल व्यक्तित्व, कृतित्व और चरित्र खो जाता है, कई बार तो उसे, उसके विपरीत में बदल दिया जाता है। इसके सबसे बड़े उदाहरण बुद्ध, ईसा और मार्क्स हैं। हमारे देश में आधुनिक युग में, जो महानायक, इस ट्रेजड़ी का शिकार हो रहा है, वे हैं–भीमराव अांबेडकर।

आंबेडकर को ट्रेजड़ी का शिकार बनाने में ब्राह्मणवादी, मनुवादी और द्विज संस्कृति की समर्थक शक्तियों ने जितनी बड़ी भूमिका निभायी है, उतनी ही बड़ी भूमिका तथाकथित आंबेडकरवादी आंदोलन के झंडाबरदारों की भी है। इसमें भांति-भांति के वामपंथियों की भी काफी भूमिका रही है। ये शक्तियां अलग-अलग और कई सारे मामले में एकजुट तरीके से आंबेडकर की त्रासदी के लिए जिम्मेवार हैं। कुछ ने यह काम अपने स्वार्थों के लिए और कुछेक ने उनके प्रति अपनी नफरतों, नासमझियों तथा समाज एवं इतिहास की यांत्रिक, जड़सूत्रवादी और सरलीकृत-एकरेखीय समझ के चलते किया।   

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पहले आंबेडकर के सबसे नये तथाकथित समर्थक राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (आरएसएस) और उसकी राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को लेते हैं। इन्होंने आंबेडकर को हिंदू धर्म का सबसे बड़ा रक्षक घोषित कर दिया है। संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने तो यहां तक कह दिया कि आंबेडकर ‘संघ की विचारधारा में यकीन करते थे’, संघ के सहकार्यवाहक सुरेश भैया जी ने उनकी तुलना हेडगेवार से की। संघ के मुखपत्र– ‘पांचजन्य’ और ‘ऑर्गनाजर’ ने आंबेडकर पर विशेषांक निकाल कर उन्हें पक्का हिंदू राष्ट्रवादी साबित कर दिया और उन्हें मुसलमानों का विरोधी ठहरा दिया। भारत के  प्रधानमंत्री तो आजकल रात-दिन आंबेडकर और दलितों के नाम की माला जपते दिखायी देते हैं। मसीहा, महानायक, संविधान निर्माता आदि-आदि विभूषणों से विभूषित करते रहते है।

डॉ. आंबेडकर पर आधारित नरेंद्र जाधव की चार किताबों के विमोचन के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत

आंबेडकर  की थाती के साथ इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि ब्राह्मणवाद, मनुवाद और वर्णाश्रमी-जातिवादी हिंदू धर्म का समूल नाश उनके जीवन का सबसे बड़ा मिशन था, उन्हें उसका हिमायती घोषित कर दिया जाए।

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वैदिक, सनातन या हिदू धर्म के हजारों वर्षों के इतिहास में, जिस व्यक्ति ने जोरदार हमला बोला, वह आंबेडकर हैं। उन्होंने स्पष्ट तौर पर पहचाना था कि हिदू धर्म की रीढ़ जाति है। जाति के समूल नाश के साथ ही हिदू धर्म भरभरा कर गिर जायेगा। इसी बात को उलट कर वे इस प्रकार कहते थे कि हिंदू धर्म के नाश के बिना जाति का विनाश संभव नहीं है। अपनी किताब ‘जाति का विनाश’ में आंबेडकर स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि ‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि जाति, आधारभूत रूप से हिंदुओं का प्राण है’, ‘ब्राह्मणवाद के जहर ने हिंदू समाज को बर्बाद कर दिया है’। वह हिंदू धर्म से छुटकारा पाने को नरक से छुटकारा पाना कहते थे। बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद उन्होंने कहा कि “हिंदू धर्म में कभी नहीं मरूंगा–  यह प्रतिज्ञा मैनें आज से 21 वर्ष पहले की थी और उसे आज पूरा कर दिखाया। इस धर्मांतरण से मैं बहुत ही खुश और प्रफुल्लित हूं। मुझे ऐसा मालूम होता है कि मैं नरक से छुटकारा पा गया हूं।”

आंबेडकर और कांग्रेसी

अब कांग्रेसियों को लेते हैं, आजादी के पूरे आंदोलन के दौरान उन्हें गद्दार और ब्रिटिश उपनिवेशवाद का समर्थक घोषित करने वाले कांग्रेसी संघ और भाजपा इस बात के लिए होड़ कर रहे हैं कि बाबा साहब उनके अपने हैं। आंबेडकर ने 1945 में एक किताब लिखी– ‘कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया?’। आंबेडकर ने इस किताब में ब्यौरेवार बताया है कि कैसे तिलक से लेकर गांधी तक की कांग्रेसी इतिहास दलितों के हितों के खिलाफ रहा है। गांधी के साथ मजबूरी में पूना पैक्ट (1932) इसमें से एक था। इस पैक्ट का अछूतों के लिए क्या घातक परिणाम हुआ इसकी चर्चा करते हुए, उन्होंने कहा है कि ‘स्पृश्य हिंदुओं के बहुमत के आधार पर गाधी और कांग्रेस ने मेरा और मेरे पक्ष का राजनीतिक जीवन खत्म कर दिया’। कांग्रेस और उसके नेताओं द्वारा आंबेडकर को अपमानित करने, धोखा देने का इतिहास कांग्रेसी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने तक जारी रहा। हिंदू कोड बिल के प्रश्न पर नेहरू ने उन्हें धोखा दिया। आंबेडकर कांग्रेस को जमींदारों और पूंजीपतियों का पार्टी मानते थे और कहते थे कि यह मजदूरों के दो दुश्मनों– ब्राहमणवाद और पूंजीवाद को पोषित करती है। उनकी सीधी टकराहट गांधी से थी, क्योंकि गांधी अस्पृश्यों के प्रति अपनी लाख सद्इच्छाओं के बावजूद सिद्धांततः उस जाति व्यवस्था के पुरजोर हिमायती थे, जो हजारों वर्षों से शूद्रों-अन्त्यजों के अपमान, उपेक्षा, दासता, गुलामी, अभाव और कंगाली का कारण थी। गांधी रोग के कारणों का निदान किए बिना उसके परिणामों को दूर करना चाहते थे।

आंबेडकर की प्रतिमा के आगे नतमस्तक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

वामपंथ का आंबेडकर के प्रति रवैया

यह तो रही संघ, भाजपा और कांग्रेस की बात, जो घोषित तौर पर थोड़ी मात्रात्मक भिन्नता के साथ ब्राह्मणवाद, मनुवाद, द्विज संस्कृति और पूंजीवाद के मूलतः समर्थक तथा पोषक रहे हैं। अब थोड़ा वामपंथियों की तरफ मुड़ते हैं जिनका घोषित लक्ष्य सामंतवाद और पूंजीवाद का खात्मा रहा है।

इस समय तो भांति-भांति के वामपंथी हैं। लेकिन थोड़ी निगाह पहले आंबेडकर के दौर के वामपंथियों पर डाली जाए। कांग्रेसियों से भी आगे बढ़कर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने आंबेडकर को प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया था। कांग्रेस और गांधी को तो वे कभी प्रगतिशील और कभी प्रतिक्रियावादी घोषित करते रहे, लेकिन आंबेडकर के बारे में सौ प्रतिशत निश्चित थे कि उनमें प्रगतिशीलता का कोई तत्व नहीं है। अपने लाख मतभेदों के बाद आंबेडकर ने उनसे साझा मोर्चा बनाने की कोशिश की, लेकिन वामपंथियों ने उनकी हर कोशिश को नाकाम कर दिया। वामपंथी मार्क्सवाद जैसी वैज्ञानिक विचारधारा की यांत्रिक, जड़सूत्रवादी समझ और यूरोप, रूस, चीन के आईने में भारतीय सच्चाई को देखते रहे एवं भारतीय जमीन की अपनी विशिष्टताओं को समझने में नाकामयाब रहे। इन विशिष्टताओं में सबसे बड़ी विशिष्टता जाति की थी। वामपंथी जाति और वर्ग के आपसी अंतर्संबंधों को समझने में पूर्णतया नाकामयाब रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि वे आंबेडकर और जाति के खिलाफ उनके निर्णायक संघर्ष को समझना और स्वीकार करना तो दूर की बात, उस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत भी नहीं समझे। कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं का सवर्ण (द्विज) होना भी, आंबेडकर और उनके विचारों, क्रिया-कलापों के प्रति उपेक्षा, तिरस्कार और घृणा की एक महत्वपूर्ण वजह थी।

वामपंथी द्विज बुद्धिजीवियों के भीतर आंबेडकर को लेकर किस कदर नफरत थी, इसका एक घृणास्पद उदाहरण वामपंथी कार्यकर्ताओं के बीच सबसे समादृत इतिहासकार अयोध्या सिंह की इतिहास की किताब ‘भारत का मुक्ति संग्राम’ में आंबेडकर और दलित आंदोलन का संदर्भ है। वे लिखते हैं “हरिजनों के मालदार तबकों पर ब्रिटिश मिशनरियों का बड़ा प्रभाव था, इसलिए उनके कुछ संगठनों ने ब्रिटिशपरस्त नीति अपनायी। डा. आंबेडकर के नेतृत्व में चलने वाले डिप्रेस्ड क्लासेज एसोसिएशन (दलित वर्ग संघ) और हरिजनों के कुछ अन्य संगठनों ने साइमन कमीशन के सामने ज्ञापन पेश किए। बंबई में साइमन कमीशन के साथ सहयोग करने के लिए जो कमेटी बनाई गयी थी, आंबेडकर उसके सदस्य भी थे। वे बड़ौदा के राजा और महार जाति की अछूत कन्या के पुत्र थे. ..अम्बेडकर ने जो ज्ञापन कमीशन के सामने पेश किया था, वह अंग्रेजपरस्त था। हरिजनों का मालदार हिस्सा खुलेआम स्वराज के लिए चलने वाले राष्ट्रीय आंदोलन का विरोधी था।” इन पंक्तियों को पढ़कर कोई भी विवेकशील और संवेदनशील व्यक्ति स्तब्ध हो सकता है। खुलेआम आंबेडकर को बड़ौदा के राजा की नाजायाज संतान ठहराया जा रहा। अंग्रेजपरस्त तो घोषित किया ही जा रहा। यह वह किताब है जो बहुलांश प्रगतिशील वामपंथियों के पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाती है। इस अपमानजनक टिप्पणी पर वामपंथियों की तरफ से कभी कोई भर्त्सना का स्वर आज तक सुनायी नहीं दिया।

स्थिति थोड़ी बदल रही है, चुनावों में हिस्सेदारी करने वाले संसदमार्गी वामपंथी वोट के लिए ही सही आंबेडकर का नाम लेकर शायद ऐतिहासिक भूल को सुधाराना चाहते हों। अपने को क्रान्तिकारी वामपंथी कहने वाले विभिन्न धड़ों में अभी आंबेडकर को लेकर घमासान मचा हुआ है, कुछ धड़े किंतु-परंतु के साथ उन्हें और उनके द्वारा जाति पर उठाए गये प्रश्नों पर गंभीरता पूर्वक विचार करने लगे हैं और कुछ अभी भी आंबेडकर को सारतः प्रतिक्रियावादी ही मानते हैं और जाति के खिलाफ जनवादी संघर्षों को अस्मिता या पहचान का संघर्ष कहकर उसे वर्ग संघर्ष को कमजोर करने वाला संघर्ष कहते हैं।

कुछ उम्मीद पैदा करने वाले नारे ‘क्रान्ति के वास्ते, भगत सिंह-आंबेडकर के रास्ते’ या ‘जय भीम’, ‘इंकलाब’ या ‘ब्राह्मणवाद, मनुवाद और पूंजीवाद का नाश हो’ भी सुनाई दे रहे हैं। अच्छी बात यह है कि आंबेडकर और जाति के विनाश के संघर्ष में कुछ तो क्रान्तिकारी संभावना दिखी।

आंबेडकर और आंबेडकरवादी पार्टियां

अब जरा आंबेडकर पर अपनी दावेदारी जताने वाले और खुद को आंबेडकरवादी कहने वाली पार्टियों, संगठनों और व्यक्तियों का जायजा लें। इसमें सबसे पहले आंबेडकर के नाम पर खड़ी की गयी राजनीतिक पार्टियों को लेते हैं। खुद आंबेडकर द्वारा खड़ी की गयी रिपब्लिकन पार्टी के अवसरवाद की तो कोई इंतहा ही नहीं है। विभिन्न धड़ों में बंटी यह पार्टी ने आंबेडकर का जितना बंटाधार किया है, उसे देखकर थोडा भी आंबेडकर और उनके विचारों से परिचित व्यक्ति का सिर शर्म से झुक जाएगा।

दूसरी पार्टी है– बहुजन समाज पार्टी (बसपा)। पहले तो इसने आंबेडकर को उनके जाति उच्छेद के क्रान्तिकारी विचारों से काट कर अलग-अलग जातियों के पहचान को उभारने पर जोर दिया, दलितों के भौतिक आधारों को विकसित और मजबूत बनाने वाले आर्थिक विचारों (कृषि भूमि के राष्ट्रीयरण और बड़े और बुनियादी उद्योगों के राष्ट्रीयकरण) से काट दिया। कांशीराम के नेतृत्व में प्रारम्भिक दौर में चले सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों ने ब्राह्मणवाद-मनुवाद को एक हद तक धक्का पहुंचाया। मायावती के नेतृत्व में सत्ता प्राप्ति ने दलितों में एक हद तक आत्मविश्वास भी जगाया, लेकिन बहुत जल्दी ही सब कुछ एक राजनीतिक अवसरवाद में बदल गया। सत्ता ‘मास्टर की’ है, आंबेडकर के इस नारे को विकृत और विरूपित करके निहित स्वार्थों के हित में, हर तरह के भद्दे से भद्दे अवसरवाद का परिचय दिया जा रहा है। बहुजन सर्वजन में बदल गया। हाथी गणेश बन गया। ब्राह्मणवाद विरोध को बसपा ने अवसरवाद में बदल दिया है।ट्रेजडी यह है कि यह सब कुछ आंबेडकर और उनके विचारों  के नाम पर किया जा रहा है।

एक और राजनीतिक समूह है– अनुसूचित जातियों के लिए सुरक्षित सीटों से चुनाव जीतकर संसद या विधान सभाओं में जाने वाले अनुसूचित जातियों के सदस्य। पूना पैक्ट ने पहले ही इनकी कमर तोड़ दी है, इनका आंबेडकर से सिर्फ इतना ही लेना-देना है कि अपनी पार्टियों के हाईकमान के साथ हुआं-हुआं करें। रहा प्रश्न दलितों के मुखर शिक्षित मध्यवर्ग के एक बडे हिस्से का, जिसके आर्थिक हित आरक्षण से जुड़े हुए हैं, इस पर जब कोई आंच आती है तो यह जोर-जोर से चिल्लाने लगता है। इसने आंबेडकर के सारे विचारों को आरक्षण तक सीमित कर दिया है। जैसे यही आंबेडकर की सबसे बड़ी उपलब्धि रही हो।   

आंबेडकर के विचारों को विकृत करने में कौन-कौन शामिल हैं?

कई मामलों में तो आंबेडकर को लेकर विपरीत ध्रुवों पर खड़ी दिखती शक्तियां पुरजोर तरीके से एक साथ हैं। मिसाल को तौर पर भारतीय संविधान के निर्माण के प्रश्न पर। आरएसएस, भाजपा, कांग्रेस, बसपा और दलित आंदोलन का बहुलांश हिस्सा गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाता है कि बाबा साहब भारतीय संविधान के निर्माता हैं। यह उनके सपनों का संविधान है। ऐसा कहने और मानने वाले इस जगजाहिर तथ्य को भूल जाते हैं कि बाबा साहब ने अपने सपनों का सविधान तो अखिल भारतीय अनुसूचित जाति महासंघ की ओर 1947 में तैयार किया था। जिसे वे संविधान सभा को प्रतिवेदन के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे, जो प्रतिवेदन पुस्तक ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ के रूप में छपा। बाद में गांधी और कांग्रेस ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत आंबेडकर को संविधान की मसौदा समिति का अध्यक्ष बनाया और आंबेडकर ने भारत के भावी संविधान को जितना अधिकतम संभव हो सके दलितो, शोषितों, उत्पीड़ितों और अन्याय के शिकार सभी तबकों-वर्गों के हितों के अनुकूल बनाने के लिए जी जान लगा दिया, उन्हें आंशिक सफलती भी मिली। लेकिन यह कहना कि– यह उनके सपनों का संविधान है, आंबेडकर को विरूपित और विकृत करना है। इसकी पीछे की मंशा चाहे अच्छी हो या बुरी।

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1947 के अपने सपनों का संविधान (राज्य और अल्पसंख्यक) के मसौदे में आंबेडकर संपूर्ण कृषि भूमि के राष्ट्रीयकरण, श्रम के आधार पर खेती के उत्पादन में हिस्सेदारी और बड़े एंव बुनियादी उद्योगों के राष्ट्रीयकरण का प्रस्ताव करते हैं। लेकिन जो संविधान बना, उसमें इन बुनियादी प्रस्तावों का नामों-निशान नहीं था। सच तो यह है कि संविधान सभा भारत के छः प्रतिशत संपत्तिशाली वर्गों के मतो से चुने गये लोगों से बनी थी, जिसमें प्रत्येक सद्स्य को एक मत प्राप्त था, एक-एक प्रस्ताव पास करवाने के लिए बहुमत की जरूरत थी। संविधान सभा और उसके बाद चुनी संसद तथा मत्रिमंडल में आंबेडकर की क्या स्थिति थी, इसको इससे समझा जा सकता है कि जब उन्होंने हिंदू महिलाओं को हिंदू कोड बिल के माध्यम से हिंदू पुरूषों के बराबर अधिकार दिलाने की कोशिश किया तो उन्हें अन्ततोगत्वा कानून मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

आंबेडकर को विकृत, विरूपित, सीमित और अपने-अपने निहित स्वार्थों के हिसाब से व्यख्यायित करने की पुरजोर कोशिशों के बीच उम्मीद की कुछ किरणें भी दिखायी देती हैं। बहुजनों का विशाल तबका अपने क्रांतिकारी आंबेडकर की खोज कर रहा।

(कॉपी-संपादन : राजन)


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